Tuesday 16 April 2013

अब की-बोर्ड पर थिरकती हैं नोरती बाई की उंगलियां


करीब 20 साल पहले भारत में कंप्यूटर युग का सपना देखा गया था। यह सपना कुछ हद तक तो पूरा जरूर हुआ है, लेकिन देश के हर नागरिक के लिए यह सपना पूरा होने में अभी कुछ और वक्त लगेगा। जहां देश की शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहा है, वहीं ग्रामीण इलाके अब भी इसकी पहुंच से दूर हैं। लेकिन, इसी अंधकार के बीच एक नोरती बाई नाम की उम्मीद की किरण भी है, जिसे देखकर हमें हौसला मिलता है। 

राजस्थान में 62 साल की नोरती बाई ने कंप्यूटर सीख कर कामयाबी की वो इबारत लिखी है जो दूसरों के लिए आज मिसाल बन गई है। नोरती बाई से मेरी मुलाकात रेड रिक्शा रेवलूशन यात्रा के तीसरे दिन अजमेर जिले में उनके गाँव हरामारा में हुई। तालीम के लिहाज़ से नोरती बाई के पास गिनाने के लिए कोई उपलब्धि तो नहीं है, लेकिन कंप्यूटर चलाना सीखने के बाद गाँव के अनपढ़ लोग अब उनसे कं प्यूटर ज़रूर सीखते हैं। या हम यूं कह सकते हैं कि कंप्यूटर ने नोरती की दुनिया ही बदल दी है। इसी लगन और समाज के प्रति समर्पण को देखकर गाँव के लोगों ने उन्हें एक बार सरपंच भी चुना था, जिसके बाद पंचायत के कामकाज भी कंप्यूटर से होने लगे थे। दरअसल, नोरती बाई का कंप्यूटर का वास्ता तब पड़ा जब वो पास में ही तिलोनिया के एक सामाजिक संगठन 'बेयरफु ट कॉलेज' में काम करने लगीं।

मेरी मुलाकात के दौरान नोरती ने बताया कि अनपढ़ होने की वजह से कैसे उन्हें कंप्यूटर सीखने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए वो बताती हैं, 'शुरू में बड़ी दिक्कतें आईं, की-बोर्ड के अक्षरों को याद करना कठिन काम था। मैं संस्था तक आने और वापस गाँव लौटने के वक्त एबीसीडी जैसे अक्षरों को याद करती थी, फि र इन अक्षरों के पहचानने लगी और फि र धीरे-धीरे सब होगया।' लेकिन, अब भी ईमेल को 'इमल' और प्रिंटर को 'पेंटर' बोलने वाली नोरती कंप्यूटर में इतनी माहिर हो चुकी हैं कि गाँव के बाकी लोग उसी से कंप्यूटर सीखते हैं। नोरती के मुताबिक, वो अब तक अपने और आसपास के गाँवों के करीब एक हजार लोगों को कंप्यूटर सिखा चुकी हैं। कभी जो हाथ मेहनत मजदूरी और मिट्टी में सने रहते थे, और अब उन हाथों की उंगलियां कंप्यूटर के की-बोर्ड पर थिरकती नजर आती हैं। आज हम सब के लिए एक प्रेरणा बन चुकी नोरती बाई एक ऐसे देश में पली बढ़ी, जिसकी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी अनपढ़ है। जहां कंप्यूटर की शिक्षा देकर विकास की मुख्य धारा से जोडऩा आसान नहीं है। जिसकी साफ  तस्वीर हमें इंडिया और भारत के रूप में दिखाई देती है, जिसे पाटना आसान नहीं है। इस दूरी को सिर्फ  इंटरनेट के जरिए ही पाटा जा सकता है। 

आज हम अगर अपने पड़ोसी देश चीन पर नजर डालें तो पाते हैं कि वहां करीब तीस प्रतिशत आबादी कंप्यूटर का ज्ञान रखती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा महज दस प्रतिशत के दायरे में सिमट कर रह गया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि भारत में जिस रफ़्तार से      कंप्यूटर का प्रचार-प्रसार हुआ, उस रफ़्तार से हम कंप्यूटर की शिक्षा को नहीं बढ़ा पाए हैं। सरकार भी इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ  है।  पिछले साल राज्यसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2012 तक देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 2.28 करोड़ थी जबकि 31 मार्च-2011 को 1.96 करोड़ और 31 मार्च-2010 को 1.6 करोड़ थी। हालांकि, 2004 की ब्रॉडबैंड नीति के तहत 2010 तक इन उपभोक्ताओं की संख्या चार करोड़ किए जाने का लक्ष्य था। रिपोर्ट पेश करते हुए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने भी माना था कि इंटरनेट और ब्राडबैंड के विकास में कई बाधाएं हैं। आज जहां एक तरफ  आधुनिक तकनीक के माध्यम से दुनिया वैश्वीकरण के एक नए आयाम की तलाश में आगे बढ़ रही है, ऐसे में भारत के लिए भी ज़रूरी हो जाता है कि वह दुनिया के बढ़ते कदमों के साथ कदम मिलाकर चले। 

 हमारी प्रगति की दिशा एवं दशा दोनों का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसी शिक्षा दे पा रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में लिया गया कोई भी गलत फैसला या लचीला रवैया हमारे भावी राष्ट्र के निर्माण के लिए बाधक साबित हो सकता है। ऐसे में देश को तकनीकी रूप से और मजबूत बनने की कोशिश के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों को इंटरनेट के जरिए मुख्यधारा से जोडऩा होगा। ताकि नोरती बाई जैसी दूसरी महिलाएं भी गाँव में बैठकर दुनिया के किसी भी कोने से संपर्क कर सकें। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में जैसे-जैसे ग्रामीण भारत में पर्सनल कंप्यूटरों और वायरलेस ब्रॉडबैंड का विस्तार होगा, वैसे-वैसे भारत और इंडिया की दूरियां भी मिटती जाएंगी और फि र देश में एक नए युग की शुरुआत होगी।

(लेखक डिजिटल एंपावरमेंट फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक और मंथन अवार्ड के चेयरमैन हैं। वह इंटरनेट प्रसारण एवं संचालन के लिए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कार्य समूह के सदस्य हैं और कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए बनी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य हैं।)

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