Thursday 7 March 2013

आम आदमी नहीं, बनायें काम का आदमी



4,28,00 का आंकड़ा वित्त मंत्री के बजट भाषण के बाद देश भर में चल गया है। एक अरब बीस करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में इतने लोग मिले हैं जिनकी टैक्स देने वाली आमदनी एक करोड़ या उससे अधिक है। इसमें टाटा भी हैं अंबानी भी और हमारे जिले के कुछ लोग भी। यह संख्या कहां से आई किसी को पता नहीं। अनुमान लगा सकते हैं कि 4,28,00 करोड़पति हैं जो टैक्स देते हैं और जिनका रिकॉर्ड सरकार के पास है।

हम एक विचित्र देश में रहते हैं। यहां इस बात पर भी विवाद हो जाता है कि गरीब कितने हैं और जहां इस बात पर भी फै सला नहीं हो पाता कि अमीर कितने हैं। वो दो सौ कौन हैं जो 4,28,00 टैक्स भरने वाले करोड़पतियों में नहीं सके वर्ना यह संख्या 4,30,00 हो जाती। ये दो सौ, सौ दो सौ से रह गए या कुछ लाख से। भारत ने शून्य की खोज की थी। पर हम इस शून्य का इस्तेमाल हर संख्या को बढ़ाने में नहीं बल्कि उसे जीरो करने में ही करते रहते हैं। आपको जानकर खुशी होगी कि ये करोड़पति फाल्गुन के महीने में उदास है। वित्त मंत्री ने इन पर दस प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया है। इन करोड़पतियों का रोना इस बात पर है कि उन्हें अमीर होने की सजा दी जा रही है। अब तक ऐसा ही रोना गरीब रोते रहे कि गरीब होने की सज़ा दी जा रही है। अमीरों ने गरीबों का रोना मार लिया है। बेचारे ऐसे रो रहे हैं कि जैसे इस होली में पांच लाख वाली शराब की बोतल नसीब नहीं होगी।

अव्वल तो वित्त मंत्री को बताना चाहिए था कि ये करोड़पति ठीक से गिन लिये गए हैं या अभी और गिने जायेंगे। अंदाज़ी टक्कर से टैक्स का हिसाब पूरा नहीं होता। विदेशी और भारत में बनने वाली कारों पर टैक्स बढ़ाकर ठीक ही किया है। इस देश में लोग साठ लाख से दो करोड़ रुपये की कार पर आराम से चलने लगे हैं। चिदंबरम अगर काला धन वसूलने को लेकर गंभीर होते तो इन कारों पर और टैक्स लगाते। जैसा कि उन्होंने एसयूवी कारों पर टैक्स लगाया है। मैं इन कारों को गुंडा गाड़ी कहता हूं। ऐसी कारें ज़्यादातर छुट भैयों, नेताओं, विधायकों, सांसदों, ठेकेदारों, ईंट-भट्टा वालों के यहां ख़ूब दिखती हैं। सड़क पर यह गाडिय़ां शोहरत और ताकत के अहंकार का प्रदर्शन करती हैं। एक सामान्य कार के पीछे इतना करीब आकर ब्रेक मारती हैं जैसे कुचलकर जाने का मन बना ही लिया था मगर मेहरबानी कि फै सला आखऱी क्षण में बदल दिया। अपने आस-पास नजऱ घुमाकर देखिये, इन भीमकाय गाडिय़ों में कौन लोग चलते हैं और जब ये किसी शादी ब्याह में इनसे उतरते हैं तो इनका हाव-भाव क्या होता है। ये गाडिय़ां आप किसानों का डीज़ल पी जाती हैं। चिदंबरम की नजऱ सिर्फ  इन कारों पर पड़ी हैं वर्ना अगर वे इनके खऱीदारों को देखते तो पता चलता कि देश में करोड़पतियों की असली संख्या क्या है।

दुनिया में बड़े भारी अर्थशास्त्री हुए हैं प्रोफ़े सर अमत्र्या सेन। नोबेल पुरस्कार मिला है। प्रो सेन ने रोने का समाजशास्त्र निकाला है। कहा है कि जो अमीरों से कुछ गऱीब है वो अपने आपको आम आदमी कहने लगे हैं। ये वो मध्यमवर्ग है जो होता तो खाता-पीता है मगर मौक़ा पडऩे पर अमीर-गऱीब दोनों बन जाता है। मनमोहन देसाई की फि ल्मों की तरह। तो प्रो सेन की बात सही लगती है तो आम आदमी को अपनी नई पहचान ढूढनी पड़ेगी। वैसे आम आदमी भी अपने आप में कोई न्याय का प्रतीक नहीं है। राजनीतिक दलों को गऱीब कहना ठीक नहीं लगा तो उन्होंने आम आदमी का नाम दे दिया। मज़दूर किसान और गऱीब की श्रेणियों या पहचान को उस आदमी में मिला दिया गया जिसमें मध्यमवर्ग भी शामिल किया था। आम आदमी एक नागरिक और अराजनीतिक पहचान है। इसमें राज्य या राजनीतिक दल की नाकामी नहीं झलकती है। इसलिए जब मध्यमवर्ग इस निरपेक्ष पहचान को अपना बना लेता तो है इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। इसलिए आम आदमी को खुद से इस पहचान को छोड़ गरीब मज़दूर किसान की पहचान पर लौट जाना चाहिए। इस पहचान में उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं छिपी हैं। उस मध्यमवर्ग को आम आदमी बनकर रोने दीजिए जो आप किसानों की सब्सिडी का डीज़ल पी कर आपकी सब्सिडी का विरोध करता है।

चिदंबरम साहब का हिसाब किताब जो भी हो अगर पैसा समय पर और पूरा का पूरा आपके इलाके और हाथ में नहीं पहुंचे तो क्या ायदा। सरकार अब कई योजनाओं के पैसे सीधे आपके हाथ में देना चाहती है। यानी आम आदमी से आपका पैसा आपके हाथ का नारा है। कहीं ऐसा हो कि ये पैसे इतने कम पड़ जाएं कि आपका काम ही चले। सोचियेगा। यह योजना अच्छी तो लगती है पर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार अच्छा स्कूल और ब्लाक स्तर पर बेहतरीन अस्पताल बना कर दे जहां सबको सस्ता इलाज मिल सके। जब तक सरकार सामाजिक सुरक्षा को पेशेवर और जवाबदेही के साथ संस्थागत रूप नहीं देगी आपका कल्याण नहीं होगा। ठीक वैसे ही जैसे रिश्तेदारों के यहां से मिले विदाई के पैसे से आप अमीर नहीं हो जाते। ठीक वैसे ही जैसे दुल्हन के आँचल में चावल और दूब के साथ सौ का नोट रख देने से हमीमून का ख़र्चा नहीं निकल आता है आम आदमी नहीं सरकार से कहिये काम का आदमी बनाए। आदमी को काम चाहिए आम नहीं।

(ये लेखक के अपने  विचार हैं)

1 comment:

  1. रवीश जी ने सही लिखा है . बजट हर बार आती है चली जाती है लेकिन आम आदमी के रोजगार कैसे बढ़े ,इस पर सरकार का कोई ध्यान नहीं जाता है . हमारे प्राइमरी स्कूलों से लेकर सरकारी विश्व विद्यालयों में रोजगार के लिए अलग से कोई कार्य नही किये जाते है .यह काफी हास्यास्पद है की सरकार भारत को युवाओं का देश मान रही है और युवाओं के हाथ में सही रोजगार कैसे पहुँचे ,इसके लिए कोई उपाय नही कर रही है . ऐसे में लाज़िमी है की अधिकांश युवा गलत रास्ते की और जायेंगे ,जो एक तरह से भारत के लिए खतरनाक स्तिथी होगी .

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