Tuesday 5 March 2013

औषधियों का खजाना है नीम


दीपक आचार्य

नीम की बहुआयामी प्रकृति, इसके औषधीय उपयोगों और सारी दुनिया में लोगों के बीच इसके महत्व को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे इक्कीसवीं शताब्दी का वृक्ष घोषित किया है। जहां एक ओर आयुर्वेद में नीम के औषधीय गुणों का बखान है वहीं आधुनिक विज्ञान भी सेहत, खेती-बाड़ी और पर्यावरण संबंधित समस्याओं के सफ निवारण के लिए नीम का सहारा लिए है। पर्यावरण विषय के जानकारों के अनुसार नीम के पौधों का रोपण बड़े पैमाने पर होना जरूरी है क्योंकि यह पर्यावरण से जुड़ी प्रमुख समस्याओं जैसे वनों का लगातार विनाश होना, मरुस्थलों में वृद्धि, भू-क्षरण और पर्यावरण में तापमान वृद्धि जैसी समस्याएं को काफी तेजी से ठीक करने में मदद कर सकता है। इस लेख के जरिए ग्रामीण अंचलों में नीम के औषधीय गुणों का जिक्र कर लिया जाए।

प्राचीन आर्य ऋषियों से लेकर आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान नीम के औषधीय गुणों को मानता चला आया है। नीम व्यापक स्तर पर संपूर्ण भारत में दिखाई देता है। नीम का वानस्पतिक नाम 'अजाडिरक्टा इंडिका' है। नीम में मार्गोसीन, निम्बिडिन, निम्बोस्टेरोल, निम्बिनिन, स्टियरिक एसिड, ओलिव एसिड, पामिटिक एसिड, एल्केलाइड, ग्लूकोसाइड और वसा अम्ल आदि पाए जाते हैं। अपने अनुभवों के आधार पर कहूं तो दैनिक जीवन में नीम एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नीम के पत्ते और मकोय के लों का रस समान मात्रा में लेकर पलकों पर लगाने से आंखों का लालपन दूर हो जाता है। नीम की निबौलियों को पीसकर रस तैयार कर लिया जाए और इसे बालों पर लगाया जाए तो जुएं मर जाते हैं।

गर्मियों में होने वाली घमौरियों से छुटकारा पाने के लिए नीम की छाल को घिसकर लेप तैयार कर लिया जाए और उन हिस्सों पर लगाया जाए जहां घमौरियां और फुं सियां हों तो आराम मिल जाता है। पानी में थोड़ी सी नीम की पत्तियां डालकर नहाने से भी घमौरियां दूर हो जाती हैं। गले की सूजन दूर करने के लिए नीम की पत्तियां 5 ग्राम, 4 कालीमिर्च, 2 लौंग और चुटकी भर नमक को मिलाकर काढ़ा बना लेते हैं और रोगी को दिन में तीन बार सेवन की सलाह देते हैं। नीम के गुलाबी कोमल पत्तों को चबाकर रस चूसने से मधुमेह रोग में आराम मिलता है। लगभग 200 ग्राम नीम की पत्तियों को 2 लीटर पानी में उबालते हैं और जब पानी का रंग हरा हो जाता तब उस पानी को बोतल में छान कर रख लेते हैं। नहाने के वक्त बाल्टी में 75 से 100 मिलीलीटर इस नीम के पानी को डाल दिया जाता है। इन जानकारों के अनुसार नहाने का पानी संक्रमण, मुंहासे और शरीर से पुराने दाग-धब्बों से छुटकारा दिलाता है।

2 साल पहले न्यूजीलैंड के माओरी आदिवासियों से चर्चा के दौरान मुझे जानने को मिला कि ये आदिवासी नीम की पत्तियों के रस में दालचीनी का चूर्ण मिलाकर मधुमेह के रोगियों को देते हैं और उसके परिणाम भी काफ चौंकाने वाले हैं हलांकि इसके कोई भी क्लीनिकल और वैज्ञानिक प्रमाण अब तक मुझे देखने को नहीं मिले, फि भी इस पारंपरिक नुस्खे को आजमाने में कोई बुराई नहीं। हर्बल जानकार बवासीर जैसे कष्टकारी रोग के इलाज के लिए नीम तथा कनेर के पत्ते की समान मात्रा लेकर प्रभावित अंग में लेप की सलाह देते हैं, इनका मानना है कि ये लेप लगातार एक हप्ते तक लगाने से कष्ट कम होता जाता है। झारखंड में जड़ी-बूटी जानकार नीम के पत्तों तथा मूंग दाल को मिलाकर पीसने की सलाह देते है और इसे हल्के से तेल के साथ तलकर बवासीर के रोगी को खिलाया जाता है जिससे अतिशीघ्र आराम मिलने लगता है। इस दौरान रोगी को भोजन में छाछ चावल देने की बात भी की जाती है। इलाज के दौरान मसालों का प्रयोग बहुत कम किया जाए या सम्भव हो तो बिल्कुल करें। रोज सुबह निबौलियों का सेवन करने से भी आराम मिलता है। प्रभावित अंग पर नीम का तेल भी लगाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के कोरकु आदिवासी मलेरिया में नीम के तने की अन्दर की छाल को कूटकर कांसे के बर्तन में पानी के साथ कुछ देर के लिए खौलाते हैं और फि इसे एक कपड़े से छान लेते हैं। इन आदिवासियों के अनुसार इस पानी को यदि दिन में तीन बार मलेरिया से ग्रस्त रोगी को दिया जाए तो मलेरिया दूर हो जाता है। 

चैत्र नवरात्रि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लोग माता की भक्ति के साथ-साथ साल भर निरोगी रहने रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए नीम के ताजे कोमल पत्तों के रस 1 गिलास का सेवन प्रतिदिन पूरे चैत्र मास के दौरान करते हैं। नीम के एंटीबैक्टिरियल गुणों की जानकारी सदियों से हम भारतीयों को है लेकिन कहीं ना कहीं हमारे नकारात्मक रवैये की वजह से हमने सिंथेटिक और रसायनयुक्त एंटीबैक्टिरियल उत्पादों को बाजार में आने का न्योता दे दिया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नीम की पत्तियों को जोर-जोर से कुछ देर के लिए हथेली पर रगड़ लिया जाए और साफ  पानी से हथेली धो ली जाए तो हथेली से सूक्ष्मजीवों का नाश हो जाता है यानि नीम एक हैंडवाश की तरह काम करता है और मजे की बात ये भी है कि इसके परिणाम बाजार में बिकने वाले किसी भी हैंडवाश से ज्यादा बेहतर हैं। नीम की निंबोलियों को सुखा लिया जाए, चूर्ण बनाकर रख लिया जाए और दाढ़ी बनाने या हेयर रिमूव करने के बाद एक चम्मच पानी में आधा चम्मच चूरन पाउडर मिलाकर त्वचा पर रगड़ लिया जाए तो आपको किसी भी एंटीसेप्टिक उत्पाद की जरूरत नहीं। सवाल यहां किसी उत्पाद को बेहतर या कमजोर बताने का नहीं है, सवाल है यह है कि जब हमारे आसपास ही हमारी स्वास्थ्य समस्याओं या बेहतरी के लिए उपाय उपलब्ध हैं तो हमें अपनी जेबें ढीली करने की जरूरत क्या है? गाँव कनेक्शन के साथ मिलकर मेरा यही प्रयास है कि पाठकों को प्रकृति के नजदीक लाया जाए और उन्हें हिन्दुस्तानी आदिवासियों के सस्ते, सुलभ और ईको फ्रेंडली हर्बल फार्मुलों से अवगत कराया जाए। प्रकृति से जुडि़ए स्वस्थ रहिए और मस्त रहिए।

3 comments:

  1. inke lekh mujhe jameeni lagte hai, banawat nahi hoti hai, inka email adress kidhar se milega

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  2. mer ko inke lek ache lgte he.

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  3. sir inka mobile number kaise milega.

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