Wednesday 27 February 2013

रेडियो ही गाँव के लोगों का अपना माध्यम




मुकुल श्रीवास्तव 
सूचना क्रांति का शहर केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजिटल डिवाइड को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा जनमाध्यम है जो ग्रामीण भारत की सूचना ज़रूरत को पूरा करने में सक्षम है, पर मुनाफे की इस दुनिया में भारत के उन लोगों की आवाज़ हाशिए पर ही है। जो गाँवों से आते हैं 'इसका एक अच्छा विकल्प सामुदायिक रेडियो हो सकता है' देश की जनसंख्या, और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के हिसाब से यह संख्या नाकाफ है। भारत के दो छोटे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका का रिकॉर्ड सामुदायिक रेडियो के संदर्भ में बहुत बेहतर है। संभावनाओं के लिहाज़ से सरकार ने इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया है। इस समय भारत में 126 सामुदायिक रेडियो स्टेशन प्रसारण कर रहे हैं, सरकार ने सामुदायिक रेडियो आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए 12वीं पांच वर्षीय योजना में सौ करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगी। इस योजना अवधि के दौरान पांच सौ नये सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना का प्रस्ताव है। जिसमे वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए नब्बे करोड़ रुपये का प्रस्ताव किया गया है। जबकि प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की जागरुकता संबंधी गतिविधियों के लिए दस करोड़ रुपयों का प्रस्ताव किया गया है। इस क्षेत्र को अनुसंधान ओर नवीनीकरण के लिए अनुदान देने हेतु भी प्रावधान किये गये हैं। देर से सही पर यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। केंद्र सरकार सामुदायिक रेडियो ऑपरेटरों से लिया जाने वाला वार्षिक स्पेक्ट्रम शुल्क भी पूरी तरह से समाप्त करने पर विचार कर रही है। भारत में सामुदायिक रेडियो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, एक लंबे अरसे तक रेडियो तरंगों पर सरकारी अधिपत्य रहा है। सुप्रीम कोर्ट का रवरी 1995 में दिया गया आदेश निर्णायक रहा, जिसके अनुसार ध्वनि तरंगे सार्वजनिक संपत्ति हैं और यहीं से भारत में रेडियो के बहुआयामी विकास का रास्ता खुला। यह तथ्य अलग है कि सरकार ने रेडियो के पूर्णता व्यावसायिक पक्ष पर ध्यान दिया और एफ एम रेडियो स्टेशन शहर में केंद्रित रहे। सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की शक्ति वाले ट्रांसमीटर की सहायता से 5 से 15 किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र तक पहुंचने वाले ऐसे छोटे रेडियो स्टेशन हैं जो एफएम बैंड पर प्रसारण करते हैं। एफ एम बैंड पर प्रसारण करने के कारण इनकी आवाज़ गुणवत्ता पारंपरिक रेडियो प्रसारण से बहुत बेहतर होती है।  इन सामुदायिक स्टेशनों को व्यवसायिक एफ एम रेडियो स्टेशन की तरह उन्मुक्त विज्ञापन सुविधा का लाभ नहीं दिया जाता। इनकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य सिर्फ  मनोरंजन होकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संरक्षण विकास के लिए कार्य करना है। यह सीमित मात्रा में ही विज्ञापन ले सकते हैं।

भारत बदल रहा है, पर गाँव तकनीक के तारों से उतनी तेजी से नहीं जुड़े जनमाध्यम का दावा करने वाले समस्त माध्यम शहर केंद्रित ही रहे, सिर्फ  रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जो गाँव के लोगों का अपना माध्यम रहा, पर तकनीकी गुणवत्ता के लिहाज से ये प्रसारण उतने श्रवणीय नहीं रहे, दूसरे देश में हुई मोबाइल क्रांति ने हर हाथ में रेडियो पहुंचा दिया पर मोबाइल रेडियो की समस्या यह है कि यह सिर्फ  एफ एम बैंड पर ही काम करते हैं। ऐसे में आकाशवाणी का पारंपरिक प्रसारण इस तकनीक को गाँवों में आगे नहीं बढ़ा पाया। ऐसे बदलाव की प्रक्रिया में सामुदायिक रेडियो की तरक्की का रास्ता खुला, जो अपने विशेषीकृत कार्यक्रमों से भौगोलिक और समान रुचि के श्रोताओं की सेवा कर सकते हैं। वे ऐसी सामग्री का प्रसारण करते हैं जो कि किन्हीं स्थानीय विशिष्ट श्रोताओं में लोकप्रिय हैं। जिनकी अनदेखी महज इसलिए कर दी जाती है कि वे व्यावसायिक रूप से मुनाफ नहीं दे सकते। इनका संचालन सामुदायिक स्तर पर होता है, जो लाभ कमाने के लिए नहीं होता, यह व्यक्ति विशेष समूह और समुदायों की अपनी परम्पराओं अनुभवों को श्रोताओं तक बांटने की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं। भारत के गाँवों के लिए यह रेडियो सही मायने में जनमाध्यम की भूमिका निभा सकते हैं। सरकार को इस दिशा में और ठोस प्रयास करने की जरूरत है कम से कम हर ब्लॉक में एक सामुदायिक रेडियो की स्थापना होनी चाहिए जिसके संचालन का जिम्मा पंचायतों के द्वारा किया जाना चाहिए। गाँवों में सूचना प्राप्ति का बड़ा माध्यम अभी भी रेडियो ही है, तकनीक के लिहाज से गाँवों की क्या स्थिति है इसकी बानगी ये आंकड़े करते हैं, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ  इंडिया के मुताबिक, भारत की ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 18 प्रतिशत को इसके इस्तेमाल के लिए 10 किलोमीटर से ज्यादा का सफ करना पड़ता है।
  (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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