Tuesday 5 February 2013

गरीबी की गणित को हल करके बने वैज्ञानिक



लखनऊ।  जेब में एक रुपया पचहत्तर पैसे थे और मुझे सुल्तानपुर से अपने गाँव जाना था, जिस बस का टिकट लिया वो छूट गई। फिर जैसे तैसे कुछ जुगाड़ करके मैं गाँव पहुंचा। इतना कहते ही डॉ. रमेश पांडेय भावुक हो गए। ये शब्द उस शख्स के हैं जिसने हाईस्कूल के बाद पहली बार शहर देखा और वैज्ञानिक बनकर देश-विदेश की खाक छान डाली।


सुल्तानपुर जिले के जय सिंहपुर गाँव से शुरू हुआ डॉ राकेश पाण्डेय का सफर उन्हें विदेशों तक ले गया। उन्हें विदेशों में मौके भी बहुत मिले वहीं बस जाने के लेकिन देश की मिट्टड्ढी की खुशबू और परिवार के प्रति उनका लगाव उन्हें वापस अपने वतन खींच लाया और वो आज  केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप)  वैज्ञानिक के रूप में अपने शोध पूरे कर रहे हैं।  

वैज्ञानिक राकेश पाण्डेय
चार भाइयों और चार बहनों के साथ दस लोगों के परिवार की थोड़ी सी खेती पर निर्भरता होने पर डॉ. राकेश पाण्डेय का बचपन काफी मुफलिसी में गुजरा। वह बताते हैं, हमें घर पर काफी काम करना प`ड़ता था। जब मैं हाईस्कूल में था तो हर रोज 40 बाल्टी पानी भरना और जानवरों के लिए चारा काटना मेरा पहला काम थाए पढ़ाई उसके बाद थी। उसके बाद मैं गाँव से 20 किमी दूर जनता इंटर कॉलेज पढऩे जाता था। मेरे माता.पिता पढ़े लिखे नहीं थे। पिता जी कहते थे जानवरों की सेवा करके और खेती करके ही पेट भरेगा। वो मुझे खेती में लगाना चाहते थे। अपनी यादों के झरोखे से अतीत को देखकर डॉ पाण्डेय थोड़ा विचलित हो जाते हैं। एक लंबी सांस भरते हुए कहते हैंएष्हमें तो सिर्फ दो ही रोटियां पता रहती थीं, पातर रोटी (पतली रोटी)और मोट रोटी, मोट रोटी। पतली रोटी गेहूं की होती थी और मोटी रोटी चने की। दो मोटी रोटियां खाने के बाद हमें एक गेहूं की पतली रोटी दी जाती थी।  

इस सबके बावजूद डॉण् पाण्डेय की शिक्षा का सफर जारी रहा। इंटर तक लालटेन में ही पढ़ाई की उसके बाद हमने पहली बार बिजली   की रोशनी देखी। लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी;बॉटनीद्ध करने के बाद साल सन् 1982-83 में कानपुर विवि से एमएससी और 1988-89 में पीएचडी करने के बाद भारत सरकार और जर्मनी के एक एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 1991-92 में जर्मनी में रहा। उसके बाद ब्रिटेन, हॉलैंड अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा की। 2003 से 2005 तक अमेरिका में एक विजि़टिंग साइंटिस्ट के तौर पर रहने के दौरान, नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों के साथ काम करने का मौका भी मिला। डॉ. पाण्डेय बताते हैं।

यह पूछने पर कि आप के समय के गाँव और आज 21वीं सदी के गाँवों में क्या बदलाव आया हैघ् इस पर डॉण् पाण्डेय कहते हैंए ष्आज गाँवों में पढ़ाई का स्तर काफी सुधर गया है। प्राइवेट स्कूल काफी खुल गए हैं। लोग पढ़ाई को लेकर चिंता भी अधिक करने लगे हैं।ष् साथ ही अपने समय के गाँव के जीवन की तस्वीर खींचते हुए बताते हैंएष्हम सभी लोग पुआल पर लेटते थेए मच्छरों को भगाने के लिए कंडों को सुलगाकर धुंआ कर लेते थेए क्योंकि मच्छरदानी खरीदने की हैसियत नहीं थी और छप्पर में लालटेन टांग कर पढ़ाई करते थे। अब गाँव में लाइट आ गई है। पर गाँव में मेरा मकान अभी भी मिट्टी का ही है।

इन समस्याओं के बावदून डॉण् पाण्डेय ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। अपने कमरे की दीवारों और अलमारी में रखे अवाड्र्स और प्रशस्ति पत्रों को दिखाते हुए कहते हैं, इंसान को अपने लक्ष्य से हटना नहीं चाहिए। अगर इमानदारी से मेहनत कर रहे हैं तो अवार्ड अपने आप ही मिलते रहेंगे। 

डॉ. पाण्डेय अपनी माँ शांति देवी और पत्नी मीना पाण्डेय, जो कि टीचर हैं, के साथ लखनऊ में रहते हैं पर उनके दिल में आज भी गाँव बसता है। यह पूछने पर कि कभी आपने अपने संघर्षों की कहानी अपने बेटों को सुनाई थोड़ा मुस्कराते हुए डॉ. राकेश कहते हैं. जब कभी उन्हें अपनी जिंदगी के बारे में बताता हूं तो वह सुनने के बाद कहते हैं, पापा आप कहानी सुना रहे हो, असल में ऐसा हो ही नहीं सकता।

  

ऐसी दवाई बना रहे जिससे देर से आएगा बुढ़ापा

डॉ राकेश पाण्डेय का एक शोध किसानों के लिए सस्ती खाद बनाने का पूरा हो चुका है। जिसे वह अपनी टीम के साथ किसानों तक पहुंचा भी रहे हैं ताकि किसान अधिक से अधिक लाभ उठा सकें। उनका दूसरा शोध ऐसी दवाई को इज़ाद करने के लिए है जिससे बुढ़ापा को रोका जा सके। इस बारे में डॉ पाण्डेय बताते हैं. एंटी एजिंग (उम्र थामने) की दवाई बनाने के लिए मेरा शोध जारी है। अभी कई सफल प्रयोग कर चुके हैंए और कई बाकी हैं। इसे बनाने में करीब 8 से 10 साल और लगेंगे। 

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