Tuesday 12 February 2013

हम लालच में खत्म कर रहे हैं प्रजातियां



S.B. Misra
कुछ समय पहले कानपुर के चिडिय़ाघर में कई दर्जन दुर्लभ प्रजाति के काले हिरन एक साथ मर गए, उनके मृत शरीरों के पोस्टमार्टम हुए और कहा गया कि सबके हार्ट फेल हो गए थे। अखबारों में खबर छपी और बात आई गई हो गई, सब ने मान लिया हार्टअटैक की बात। कुछ साल पहले प्रयाग और वाराणसी में पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध के दिनों में गिद्ध, कौवे, कुत्ते और विविध जानवरों को भोजन कराने के लिए इन जीवों की बहुत कमी गई। बात अख़बारों में छपी, हमने पढ़ लिया, बस। आज हालत यह है कि मरे हुए जानवरों को खाने के लिए गिद्ध नहीं दिखाई पड़तें, हमें फि क्र नहीं होती। फिक्र होगी एक दिन जब देर हो चुकी होगी।

दूध के लालच में दूधियों ने जहरीला इंजेक्शन लगाकर जानवरों का मांस जहरीला कर दिया और जहरीला मांस खाकर गिद्ध मरने लगे, जो लगभग समाप्त हो गए हैं। अब मरे जानवर की खाल निकाले जाने के बाद खुले मैदान में पड़े मांस पर कौवे और कुत्ते गिद्ध की कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। जहरीला मांस खाकर वे भी नहीं बचेंगे और जहरीला मांस खुले में सड़ता रहेगा, इससे नई-नई बीमारियां फैलेंगी। मनुष्य अपने स्वार्थवश अपने ही विनाश को दावत दे रहा है।

जीवमंडल में जितने भी जीव-जन्तु विद्यमान हैं चाहे जल में मछलियां, मरुस्थल में ऊंट और बकरी, पर्वतीय और मैदानी भागों में गाय, भैंस आदि तथा पेड़ों पर पक्षी और कीट पतंगे, अथवा मिट्टी के अन्दर रहने वाले सांप और चूहे, सब का जीवन एक दूसरे पर निर्भर है और मनुष्य का इन सब पर। वृक्षों और पौधों के फू लों में परागण (गर्भाधान) कीट पतंगे और मधुमक्खियां करते हैं। बदले में वृक्ष उपजाऊ मिट्टी की परत को क्षरण से बचाते हैं, सूखी पत्तियों से उसे उपजाऊ शक्ति प्रदान करते हैं, और छाया देते हैं।

दलहनी सलें बोने से खेत उपजाऊ हो जाता क्योंकि ऐसी सलों की जड़ों में एक प्रकार का बैक्टीरिया होता है राइजोबियम जो हवा से नाइट्रोजन लेकर उसे मिट्टी में फि क्स करता है अर्थात जमा करता है। यूरिया खाद नहीं डालनी पड़ती। इसी प्रकार केचुआ भी मिट्टी को उलट पलट कर उपजाऊ बना देता है। गाँवों में रहने वाले लोग विविध प्रकार के जीवों को अन्न, भोजन और दूध देते हैं और पूजा में अनेकानेक वनस्पतियों का प्रयोग करते हैं, शायद अनन्त काल से वे जीव विविधता की रक्षा करते रहे हैं।

जीव विविधता करोड़ों सालों में पैदा हुई है परन्तु हमारी स्वार्थी गतिविधियों के कारण कुछ ही समय में नष्ट हो सकती है। बहुत से पशु, पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधे केवल नाम में बचे हैं। हमें इस बात का एहसास नहीं कि प्राणी और वनस्पति पर ही निर्भर है हमारा जीवन। जब हम लकड़ी, ईंधन जलाते हैं तो वायुमंडल में धुआं यानी कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़ते हैं और पेड़ पौधे इसेे अपने भेाजन के लिए प्रयोग करके बदले में प्राणवायु यानि ऑक्सीजन देते हैं। यदि पेड़ पौधे हों तो मनुष्य के लिए सांस लेने को ऑक्सीजन नहीं बचेगी। जल में रहने वाली मछलियां और अन्य जीव जल को शुद्ध करते हैं वर्ना नदी तालाबों का पानी किसी काम का नहीं रहेगा।

जीवित रहने के लिए शाकाहारी प्राणी तो वनस्पति का सेवन ही करते हैं और मांसाहारी प्राणी भी जिन जन्तुओं को खाते हैं वे वनस्पति पर निर्भर हैं। विविध जीव एक दूसरे के लिए भोजन श्रृंखला बनाते हैं जैसे घास और वनस्पति को वन्य जीव खाते हैं और उन्हें शेर खाता है। परन्तु जब वन्य जीवों को मनुष्य खाने लगेगा और शेर का भोजन छिन जाएगा तो वह मनुष्य को खाएगा। इसलिए पशु पक्षियों, कीटपतंगों तथा वनस्पति को जीवित रखकर भोजन श्रंृखला को बचाए रखना है। पेड़ों के अधाधुन्ध कटान के साथ ही पेड़ों पर रहने वाले पक्षियों और कीट पतंगों का संसार भी उजड़ रहा है।

नीम, तुलसी, हल्दी, आंवला आदि के गुण हमारे गाँवों के लेागों को मालूम थे। वे चेचक के मरीज की खाट पर नीम की पत्तियां अनिवार्य रूप से रखते थे और मरते समय तक तुलसी की पत्तियां मुंह में डालते थे। पश्चिमी देश भारत की इस जैव विविधता पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए बैठे हैं। वे लोग कभी नीम, कभी हल्दी , आंवला, जामुन और कभी तुलसी का पेटेन्ट कराते रहते हैं। ्रहमें अपनी ही वनस्पति के लिए विदेशियों को टैक्स देना पड़ सकता है। जैव विविधता मनुष्य की धरोहर ही नहीं बल्कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन भी है क्योंकि अनेकानेक जंगली प्रजातियों के साथ संकरण करके अनाज की नए प्रकार की रोग-अवरोधी प्रजातियां उत्पन्न की जा सकती हैं। अफ सोस की बात है कि पिछली कुछ दशाब्दियों में ही हमारी वे अन्न की प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं जो उत्पादन भले ही कम देती थीं परन्तु उनमें रोग नहीं लगते थे। विदेशियों का कुचक्र चल रहा है। उन्होंने एक अद्भुत तरीका निकाला है जिससे वे विलुप्त हो रही प्रजातियों के ''जीन्स" निकाल कर जीन्स बैंक बना रहे हैं। इस प्रकार जब सारे विश्व में जन्तुओं और पौधों की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी तब भी पश्चिमी देशों के जीन्स बैंकों में वे प्रजातियां विद्यमान रहेंगी। वे जब चाहेंगे उन्हीं जींस की मदद से फि से अपने देश में जानवर और अनाज की वही प्रजातियां उत्पन्न कर लेंगे। गरीब देश देखते रह जाएंगे।

No comments:

Post a Comment