Tuesday 26 February 2013

34 सालों से तैयार कर रहे हैं बोन्साई पेड़


जीतेन्द्र द्विवेदी 

गोरखपुर। शहर के 10 नंबर बोरिंग निवासी रवि द्विवेदी पेशे से तो बैंककर्मी हैं लेकिन आज उन्हें लोग 'मिस्टर बोन्साई' के नाम से जानते हैं। वाकई, इनके हौसले का कोई जबाव नहीं है। प्रकृति के असल प्रेमी रवि की पेड़ों में जान बसती है। रवि के पास बोन्साई पेड़ों का अद्भुत  संकलन है। जो उन्होंने 34 सालों में तैयार किया है। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर को संरक्षित रखना उनके जीवन का मकसद बन गया है। अब तक पांच सौ से अधिक लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित कर चुके है। सचमुच इतने बड़े पैमाने पर बोन्साई पेड़ों को लगाना रवि की ही बस की बात है।

अपने उगाए पोधों के साथ रवि द्विवेदी
हुआ यूं कि 1976 में जब वह जयपुर अपने एक रिश्तेदार के यहां गए थे वहां पर बोन्साई पेड़ देखा। रिश्तेदार से पूछा तो उन्होंने कहा कि इसे लगाना सबके बूते की बात नहीं है। बस यहीं से रवि ने बोन्साई पेड़ लगाने का फैसला कर लिया। जयपुर से एक पेड़ लाए और उसे लगाया। यह आगाज था और अंजाम सबके सामने है। रवि की बगिया में 32 साल पुराना बरगद और 22 साल का पाकड़ सहित 175 तरह के पेड़ों की प्रजातियां मौजूद हैं जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रत्येक पेड़ की कीमत 20 से 25 हजार है। रवि कहते हैं कि उनकी पत्नी बृज मोहनी द्विवेेदी ने उनका पूरा साथ दिया है जिसकी बदौलत उनके पास आज यह अनमोल खजाना है।

वैसे तो पूर्वांचल में बोन्साई पेड़ लगाने वाले और भी लोग हैं लेकिन सिर्फ  संरक्षित करने और लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्ररित करने वाले वे अकेली शख्सीयत हैं। वे पेड़ों को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए नहीं लगाते हैं। उनकी मंशा है कि शहर में जिन लोगों के पास जमीन नहीं है वह लोग भी अपने घर में कम से कम दो से तीन पेड़ लगाएं, ताकि प्रकृति की विलुप्त हो रही प्रजातियां संरक्षित और सुरक्षित रह सकें। वह चाहते हैं कि शहर में एक बोन्सार्ई गार्डेन बने और एक फ़ोरम बनाया जाए जो लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करे।

कहां से लाए पेड़
रवि द्विवेदी ने पेड़ों का खजाना तैयार करने के लिए काफी जगहों का भ्रमण किया है। केरल से काफी, ाशमीन, राजस्थान से गूलर, बबूल, बंगाल से इमली जामुन, जयपुर, शिमला से अनार और पंतनगर से डेनियम का पेड़ लाए है। पाकड़, पीपल और बरगद की प्रजातियां यूपी के कई शहरों से उन्हें मिली है।

लगाने की विधि
पुराने पेड़ों को कलम कर जमीन में लगाते हैं। साल भर बाद गमले में डाल देते हैं। खाद के तौर पर सिर्फ  गोबर की सड़ी खाद डालते है। फि साल भर बाद पतले पाट में पेड़ को लगा देते हैं। पाट की मिट्टी में लकड़ी कोयला का चूरा, सुरखी, नीम की खली, हड्डी का चूरा मिलाकर डालते हैं। हर पेड़ में खाद की मात्रा अलग होती है। तने को पाइप के जरिए मिट्टी में लगाते हैं। जड़ों की कटाई-छंटाई भी करते रहते हैं

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