Tuesday 15 January 2013

टीवी के अन्दर बाबा टीवी के सामने बुड़बक



प्यारे भक्तजनों,
त्रेता युग में जब राक्षसों का संहार बढ़ते बढ़ते चरम सीमा तक पहुँच गया तो।

अरे भाड़ में गया त्रेता युग! उसे छोडि़ए, उसे काफी टाइम हो गया ख़त्म हुए। अब तो इतिहास की पुस्तकों के लिए भी वो इतिहास हो गया। अब हम टीवी युग में हैं और हम जब से बाबा बने हैं तब से तो हम बस अपना ही युग बनाने में जुटे हैं। एक बखत था जब साधु महात्मा हिमालय की कंदराओं में जाकर एकांतवास करते थे, समाधि लगाते थे, महीनों महीनों तपस्या करते थे, ठंड की परवाह किये बिना भगवान की प्रार्थना में लीन रहते थे।

वैसे अब भी हम ठंड की परवाह किये बिना भगवान की प्रार्थना में लीन रहते हैं। हां, जब ज्यादा ठंडी लगने लगती है तो सहायक से कहते हैं कि एसी का टेम्प्रेचर जऱा बढ़ा दे। असल में फाइव स्टार होटलों में ये लोग तापमान इतना कम रखते हैं कि हमें हमेशा बड़ी झुंझलाहट होती है। कभी अपने मन का खाने को मिलता है, ठीक से व्यायाम कर पाते हैं। प्राणायाम करने चलो तो तरह तरह की खुशबुएं हवा में तैरती मिल जाती हैं।
हम जानते हैं कि आप यह सोच रहे होंगे कि हम कैसे सन्यासी हैं। जो एक तरफ तो जीवन के सुखों का त्याग करके प्रभु की वंदना में लीन होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर इन शारीरिक सुखों का आनंद उठा रहे हैं। एक तरफ  तो भारत के अध्यात्म के हजारों वर्ष पुराने इतिहास का दंभ करते हैं, इस धरती के महान सन्यासियों का दिखाया सन्मार्ग औरों को दिखाने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ  चमचमाती जि़ंदगियां जीते हैं।

अरे मासूम भक्तगणों, हम अब भी सन्यास के मार्ग पर अटल, अडिग चल रहे हैं! हमने सन्यास को सन्यास दे दिया है!

अब हम टीवी पर रोज आते हैं। कभी-कभी कंप्यूटर की सहायता से हमारे मुखमंडल के पीछे एक आभा भी बिखेर दी जाती है, ठीक वैसी ही जैसी मुरली वाले कृष्णा भगवन के पीछे होती है चित्रों में। हमारे चित्र भारत के कोने कोने में, बस, ट्रेन, टेम्पो, बग्गी, दूकान, मकान, हर छोटे बड़े प्रतिष्ठान में आपको मिल जायेंगे। टीवी पे हम अच्छी-अच्छी बातें रोज आप भक्तगणों को बताते हैं। कभी-कभी हम रथ पे आते हैं, कभी पालकी पे। भक्त घंटों-घंटों हमारी प्रतीक्षा करते हैं, जैसे कोई फि ल्म स्टार रहा हो। जी हां, फि ल्म स्टार भी हमारे पास आते हैं! और हमारी सभाओं में आप जितना ज्यादा पैसा दे पायें, उसके हिसाब से आपको आगे और आगे सीट मिल जाती है। धर्म के मामले में समाजवाद कहां होता है भैया! हमारे आश्रम दुनिया के कोने कोने में हैं, हमारे आश्रमों के पास कई एकड़ ज़मीने हैं, इतनी कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के पास भी कहां होंगी ? हमने गाना भी सीख लिया है। अब हम भजन गाते हैं।

कुछ अज्ञानी लोग हमें फि भी पिछड़े ख्यालों का बताते हैं।
पिछले दिनों दिल्ली में एक बड़ी ही दुखद घटना हुई थी एक बालिका को लेकर जिस पर हमारे साधु समाज के एक सदस्य ने एक छोटी सी टिप्पणी की, और उस पर इतना बवाल खड़ा हो गया। उन्होंने बस इतना कहा था कि अगर वो बच्ची उस आततायी का हाथ पकड़ कर उसे भाई बोल देती, गिड़गिड़ाती तो शायद ये घटना नहीं होती। गलती सिर्फ  एक पक्ष की  नहीं थी।

अब ये क्या उन साधु बाबा का दोष है कि वो किसी बच्ची के पिता नहीं हैं? कि वो उस तकलीफ  को नहीं जानते जो एक पिता को होती है। जब उसकी बेटी को जरा सी भी तकलीफ  होती है। वो तो मासूम हैं। बल्कि उन्होंने तो ये भी कहा कि पत्रकार भौंकने वाले कुत्ते हैं। अब इस पे भी बवाला हो गया। उन्होंने ये कहां कहा कि भौंकने वाले कुत्ते खऱाब होते हैं।

दोष उन पत्रकारों का नहीं है, ये उनके मन के विकारों का है, उनके गंदे संस्कारों का है जो उनके माता पिता उनको देते हैं क्यूंकि उनके माता पिता हमारे प्रवचन में नहीं आते। ये हमारे विरोधी कहते हैं कि अगर इतने बड़े साधू महात्मा हैं आप लोग, अगर आपका इतना बोलबाला है, अगर करोड़ों लोग आपके चाहने वाले हैं, तो आप सामाजिक बुराइयों के खिलाफ  क्यों नहीं बोलते? पोलियो की खुराक खिलाने के लिए क्यूं नहीं लोगों को प्रेरित करते? लोगों को ये क्यूं अपने प्रवचनों में नहीं कहते कि वो दफ्तर में बेईमानी करें, घरों और चलती बसों में बलात्कार करें, सड़क पे कूड़ा फेंकें, सड़क पे थूकें ना।

अरे अगर साधू महात्मा लोगों को ये सब बताने लगे तो नगरपालिका वाले, पुलिस वाले, सरकार में कुर्सियों पे बैठने वाले क्या करेंगे? साधु महात्माओं का काम तो दैवी मामलों से जुड़ा होता है, इस नश्वर शरीर का ख्याल रखना, अच्छा नागरिक बनना, टैक्स अदा करना, ये सब तो आम लोगों के जीवन की बातें हैं और हम आम लोग कहां हैं। बल्कि आम लोग नहीं हैं इसीलिए तो कितनी धार्मिक संस्थाएं टैक्स वगैरह देने में विश्वास नहीं करतीं! अरे हम तो भगवन को आस्था का टैक्स देते हैं, ये सरकारें हमसे टैक्स क्या लेंगी।

अच्छा अब जा रहे हैं, टीवी पे शूटिंग का बखत हो गया है।  
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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