Tuesday 15 January 2013

विदेश से गाँव तक जा रहीं है पगडंडियां



जरा सोचिए, अचानक आपके गाँव में गाडिय़ों का काफिला जाए, उसमें से कोई भारी सुरक्षा के बीच कार से उतरे और खुद के बारे में यह परिचय दे कि वो घाना, मॅारिशस, कनाडा या जार्जिया जैसे मुल्कों का राष्ट्रपति या पीएम है और उसके पुरखे इसी गाँव के हैं। तो आपके रोंगटे खड़े होंगे कि नहीं। आपके गाँव का कोई राष्ट्र प्रमुख, किसी मुल्क का सांसद या किसी अरबों-खरबों की कंपनी का मालिक और वो कहे कि मलाह टोला के लाने का बेटा है और उस टोले में आज भी उसके चचेरे-मौसेरे भाई रहते हैं, तब और कैसा लगेगा। थोड़ी गुदगुदी भी होगी। चमत्कार पर भरोसा होगा और आप जबरन पुराने किस्सों को जोड़ कर उनके खानदान की एक तस्वीर खींचने लगेंगे। यहीं करेंगे न। वैसे भी दो चार पीढ़ी के बाद गाँवों में भी कितने लोग स्थानीय शाश्वत किस्सों में बचे रह जाते होंगे।

ठीक ऐसा ही हुआ जब पटना के पास मसौढ़ी के एक गाँव में पिछले दिनों मॅारिशस के राष्ट्रपति पहुंच गए। तीस हजार लोग बलजीतपुर गाँव पहुंच गए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मॅारिशस के राष्ट्रपति राजकेश्वर पुर्रयाग पहुंचे तो हंगामा मच गया। जिस मिट्टी को उनके पुरखे छोड़ कर गए थे उसी मिट्टी को चांदी के लोटे में भर कर भेंट किया गया। राष्ट्रपति जी ने अपने दो भतीजों की भी पहचान कर ली। गणेश नोनिया और महेश नोनिया। एक मुल्क के राष्ट्रपति के भतीजे दूसरे मुल्क में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। ये कहानी आपको फि ल्मी नहीं लग रही है। लेकिन अब ऐसी घटना आए दिन सामने आने लगी है। दुनिया भर में फैले यूपी बिहार के लोग अपनी जड़ों को खोज रहे हैं। सौ दो सौ साल पहले गुलाम या गिरमिटिया बनाकर मजदूरी के लिए ले गए इन लोगों की नई पीढ़ी अपने पुरखों के गाँव खोज रही है। आपके गाँव से कौन-कौन गया, इसका रिकॉर्ड है आपके पास। जल्दी से पता कीजिए, उसका पूरा ब्योरा बनाइए और सरपंच के पास जमा कर दीजिए। क्या पता आपके गाँव में भी कोई ऐसा पहुंच जाए। गाँव की किस्मत बदल जाए।

बिहार सरकार ने तो ऐसे लोगों की तलाश में मदद के लिए पर्यटन विभाग को ही ये काम दे दिया है। वंशावली का पता रखने वाले लोगों की मदद से इन जड़ों की तलाश की जा रही है। हमारे यहां आज भी चारण या भाट यह काम करते हैं। आज भी यह काम हो रहा है। दिल्ली में ही एक गाँव में मैंने वंशावली का रिकॉर्ड रखने वाले का इंटरव्यू किया था। पोथी के पन्नों पर गोबर से लिखाई की परंपरा आज भी बची हुई है। है हैरान करने वाली बात। जब भी वंशावली रखने वाला आता है गाँव का कोई परिवार उसके खाने का इंतजाम करता है। परिवार के नए सदस्य का नाम अपनी वंशावली में लिखकर चला जाता है। दिल्ली में ही जो गाँव बसे हैं उनके भीतर से भी लोग दूसरे गाँव जाकर बसे और वहां एक नया गाँव बस गया। अफ गानिस्तान से आकर बसे हुए लोग अब एक नई कद काठी और संस्कृति में ढल गए हैं लेकिन तब भी कुछ कुछ सदियों पुरानी उस पंरपरा का बचा हुआ है। कम से कम वंशावली के पन्नों पर नाम तो मिल ही जाते हैं।

गाँवों से रोज पलायन हो रहा है। पलायन का मतलब भागना नहीं होता है बल्कि नए असवरों की तलाश में जाना होता है। जिन्होंने अपनी मिट्टी छोड़ी है और नई जगह मुकाम बनाए हैं। उनकी मेहनत-भावनात्मक तड़प को समझना आसान नहीं। वो दिन भर अपनी मिट्टी की खुशबू खोजते रहते हैं। पिछले बीस सालों में हिन्दुस्तान में ही बड़ी संख्या में लोग इधर से उधर हो गए। ज्यादातर लोगों में गाँव लौटने की तड़प अब भी बची हुई है। तभी त्योहारों के वक्त वे ट्रेन में किसी तरह जान पर खेलकर सवार होते हैं और गाँव आते हैं। इसी तरह का पलायन शहरों के बीच भी हो रहा है। बहुत से लोग अब स्थानीय स्तर पर बसने भी लगे हैं। इसी कारण छठ जैसे त्योहार के वक्त मुंबई की जुहू बीच, दिल्ली के यमुना किनारे और कोलकाता में लाखों की भीड़ हो जाती है। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग अब गाँवों की तरफ  जाना कम कर रहे हैं। इन्हीं की पीढ़ी एक दिन आपके गाँव जड़ों को खोजते हुए आएगी। तब आप क्या करेंगे ? क्यों जो गया है उसका पता लगाकर रिकार्ड रखा जाए और गाँव की कमाई का जरिया ही बना लिया जाए। मैं इसलिए कह रहा हूं कि अब वक्त गया है कि हर गाँव की अपनी वेबसाइट हो। अव्वल तो दिल्ली के आस-पास के कई गाँव पूरी तरह से ही समाप्त कर दिये गए। हमें ऐसे गाँवों की स्मृतियों को भी बचाने की पहल करनी चाहिए।

अब देखिये अंग्रेजी का एक अखबार है हिन्दू। इसमें एक दिन खबर छपती है कि पंजाब के तरण तारण जिले के किसान खेती करने के लिए तबलिसी जा रहे हैं। तबलिसी क्या है। ये जार्जिया नाम के मुल्क की राजधानी है। जार्जिया पूर्व सोवियत गणराज्य का हिस्सा है। पंजाब के किसानों के पास खेती के लिए ज़मीन नहीं है। लिहाजा ये किसान अब नए वतन में खेती की जमीन तलाश कर रहे हैं। समूह बनाकर पलायन कर रहे हैं। जार्जिया में जाकर इन लोगों ने चालीस हजार हेक्टर जमीन खरीदी है। वहां की सरकार ने भी ऐसी जमीन के प्लाट काट कर दिये हैं ताकि बाहर के देशों से किसान आकर खेती करें और खेती का विकास करें। क्या आप या आपकी सरकार ऐसा सोच सकती है ? नहीं न। लेकिन उनका तो सोचिये जो पंजाब और हरियाणा के गाँवों को टाटा बाई-बाई कह कर जार्जिया खेती करने जा रहे हैं।

कुछ सालों के बाद इनका हिन्दुस्तान आना बंद हो जाएगा और फि ये अपनी यादों में अपना गाँव और कस्बा लिये मारे-मारे फि रते रहेंगे। आर्थिक तरक्की में सुख ढूंढेंगे लेकिन हर होली लोहड़ी पर गाँव के लिए रोयेंगे। हम भी रोते हैं अपने गाँव के लिए छठ के वक्त। जो प्रवासी होता है वो हमेशा प्रवासी होता है। आप माने या मानें गाँव के लोग ही पहले प्रवासी होते हैं। आप पता करने लगेंगे तो जानकारियों का भंडार खुल जाएगा कि आपके गाँव में कहां कहां से लोग आकर बसे। अभी किसी ने कहा कि चंपारण के जिस हिस्से से मैं आता हूं वो चार सौ साल पहले गुजरात से आए लोगों से बसा है। मेरे पास अभी प्रमाण नहीं है मगर रोमाचिंत हो गया हूं सुनकर। अब जरा कल्पनाओं को दौड़ाइए तो क्या सिर्फ  संयोग रहा होगा कि गांधी सबसे पहले चंपारण ही गए। कम से कम गप्प या कयास लगाने का कितना रोमाचंक मसाला है ये। तो हमारे गाँवों में भी इतिहास की जड़े दबी हुई हैं। जरूरत है इन्हें खोदकर निकालने और पहचानने की। एक रिश्ता जो टूट गया है उसे   फि से बनाने की।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

3 comments:

  1. चौपालों पर होने वाली बतकही को नया आयाम मिल जाएगा ..रोचक

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  2. सही कहा सर हमारे पूर्वज दो सौ साल पहले गो धन का भंडार लेकर गाजीपुर के वीरपुर गाँव से आकर चंपारण के बिलासपुर में बसे !एक रोचक बात बताऊ ,बेत्तिया के उत्तर में जितने गाँव बसे है सभी बाहर से आये ! यहाँ तक जंगलो में जो धांगड,ऊरांव जनजाति है वे भी संथाल से लाकर बसाये गये अंग्रेजी राज में ! उत्तर भाग के चंपारण में बसे थारु जाती ही मूल निवासी है ! जो चंपारण के जंगलो में और तराई में बसे है! वे ही उसपार नेपाल के तराई में भी है ! सारा पश्चमी चंपारण का उत्तरी भाग, प्रवासी लोगो द्वारा जंगल काट कर बसा हुआ है! एक रोचक बात थारू समाज के मान्यता का यह है वे भी अपने को राजस्थान के राणा वंशजो का हिस्सा मानते है,वे कहते है जब मुगलों का आक्रमण होता था तो राजा और उनके लड़ाके अपने परिवार के महिलाओं की सुरक्षा के लिए विश्वस्त नौकरों और कर्मचारियों के साथ सुदूर जंगलो में उनकी हिफाजत के लिए भेज देते थे! युद्ध में राजा और उनके सेना मारे जाने के कारण वे लोग जंगलो में ही रह गए! उनका वैवाहिक सम्बन्ध भी मालकिन और चाकरों के वंशजो में ही होने लगा ! लेकिन मालकिन का हैसियत नही बदला ! घर की मुखिया वे ही होती थी ! उसका असर आज भी उनके समाज में दीखता है ! यह विषय भी शोध करने वाला है ! उनके पास इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलभ्द नहीं है,किदंती ही लगता है ! मै आपके " पहले प्रवासी गाँव " वाले कथन से पूर्ण सहमत हु ! एक लीख से हटकर अपने जड़ को तलाशने वाला रोचक विषय !

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