Sunday 20 January 2013

सड़कछाप: बदले बदले मेरे आसार नज़र आते हैं


प्यारे शहर वालों,
हम गाँव से बोल रहे हैं। पीछे भैंस बंधी है और हाथ में मोबाइल फ़ोन है। हम आज तुमसे कुछ कहना चाह रहे हैं। 

देखो हमारे तुम्हारे रिश्ते ढीले ढाले ही रहे हैं, न तुम हमको समझ पाए, न हम तुमको। हम उन दो भाइयों की तरह हैं जो हिंदुस्तान के इस घर के दो कमरों में तो रहते हैं लेकिन बात इक्का दुक्का ही होती है। हमारा कमरा तुमसे तीन गुना बड़ा है लेकिन तुम्हारे पास माल-मत्ता ज्यादा था। तुम पढ़ लिख गए, हम ज़िन्दगी की और मुश्किलों से जूझते रहे।

तुमने ज्यादा पईसे कमा लिए, हम थोडा पीछे रह गए, और तुमको हमारी फिकिर नहीं थी और हमको अपनी फिकिर करने के लए बड़ी सारी चीज़ें थीं।

हम जब छोटे थे तो तुम लोगों पे खूब गरियाते थे। सब कहते थे कि दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ तुम ही हो। हम तुम जैसे बनना भी चाहते थे, लेकिन तुम पे गरियाते भी थे। जब बच्चे पढने लिखने, नौकरी करने शहर जाते थे तो बुज़ुर्ग उनसे कहते थे, "बेटा शहर जाके बिगड़ मत जाना!" हमें कभी कभी लगता था, क्या शहर से जब कोई गाँव आता होगा तो उसके अम्मा बप्पा भी कहते होंगे, "बेटा गाँव जाके बिगड़ मत जाना!"
लेकिन हम लोग बिगड़े कहाँ थे? हम तो सीधे सादे थे, गुड़ चना खाते थे, ढोलक मंजीरा बजा के गीत सुनते सुनाते थे, चौपाल पे हंसी ठट्ठा कर लेते थे, महाजन से डरते थे, पनघट के पास से आँखों के कोने से देखते हुए गुज़रते थे, किसी के भी खेत से गन्ना उखाड़ के चूस लेते थे, किसी भी कक्कू के यहाँ ताज़ा बनता हुआ गुड़ चख लेते थे। घर में सोते थे तो धोती कुरता पहन के, शादी में जाते थे, तो धोती कुरता पहन के। वही नाईट सूट, वही डे सूट। दातून से दांत साफ़ करते थे। ज़मीन पे बैठ के खाते थे। कुएँ से पानी निकालते थे। मिट्टी के तेल की ढिबरी की रौशनी में पढाई करते थे। मिट्टी के चूल्हे में पका खाना खाते थे।

मेहनत की खाते थे, सीधा सपाट बोलते थे, धूप में जलते थे और छाँव में सोते थे। गुड़ मिला तो गुड़, और प्याज़ मिला तो प्याज़ से रोटी खा लेते थे। सिनेमा में खूब देखा होगा आप लोगों ने ये सब। 

प्यारे शहर वालों, हम भी इसी ग़लतफ़हमी में रहे सालों साल कि हम अब भी वही हैं। लेकिन हमारी पीठ के पीछे हमारा ही गाँव बदल गया और हमको बड़ी देर में भनक लगी! तुम वही रहे जिसे हम तब से गरियाते थे, और हम बदल गए!

हमें पता ही नहीं लगा कि कब दातून तोड़ा जाना बंद होने लगा और कब टूथ ब्रश खरीदे जाने लगे। कब लोग पैंट पहनने लगे। रेडियो तो इक्का दुक्का होते थे हमारे गाँव में, हर शाम समाचार सुनते थे हम, लेकिन न जाने कब एक छोटा सा टीवी आ गया। और कब पड़ोस वाले गुड्डन का लड़का शहर गया और एक सीडी प्लेयर नाम का प्राणी ले आया। बत्ती तो आती नहीं थी, तो बैटरी में तार फाँस के वो प्लास्टिक का चक्का मशीन में डाल के सिनेमा दिखाने  लगा। न जाने कब गाँव के स्कूल में भी बच्चे "गुड मोर्निंग" कहना सीख गए। न जाने कब केबल टीवी आ गया और प्यारे शहर वालों, तुम्हारी तरह ही हमारी पत्नियाँ और बहुएँ भी सास बहू के सीरियल देखने लगीं। पानी से ज्यादा सॉफ्ट ड्रिंक गावों में मिलने लगा। रोटी की जगह चाउमिन और मोमो और नूडल मिलने लगा। मोबाइल फ़ोन गाँव तक पहुँच गया और पहुंचा क्या, पहले लोगों ने पट्ट पट्ट पट्ट नंबर दबाना सीखा, फिर एसेमेस करना सीख गए। गाँव के लड़के लड़कियां रात को वैसे ही गुपचुप बाते करने लगे मेरे प्यारे शहर वालों, जैसे तुम्हारे वहां करते हैं। हम कितना बदल गए हैं, प्यारे शहर वालों। हमें तो अक्सर लगने लगता है कि हम जल्दी ही तुम्हारे जैसे हो जायेंगे। हम भी छुरी कांटे से खायेंगे, डाइनिंग टेबल पर बैठेंगे और पालथी मारना भूल जायेंगे।

लेकिन तुम्हारी नकल करते करते हम ये भूल गए, प्यारे शहर वालों, कि हम असल में अभी तक बदले ही नहीं। हमारा किसान शहर का कपडा अपने बदन और अपने मन पर पहनने लगा है। लेकिन वो अब तक नहीं जान पाया कि सबसे बड़ा बदलाव सोच में होता है, सिर्फ रहन सहन में नहीं। हम गाँव वाले ये जानने की कोशिश ही नहीं कर पाए कि नयी दुनिया में खेती के कितने कए तरीके आ गए हैं। अभी भी खेती वैसे ही करता है किसान जैसे उसके पुरखे किया करते थे। मिट्टी की जांच नहीं करता वो किसान, केमिकल पे केमिकल झोंकता जाता है खेत में और जान निकाल लेता है मिटटी की। एस एम् एस करते करते, चोरी छुपे मिलते जुलते जब शहर की तरह लड़के लड़कियां प्रेम कर बैठते हैं तो कहा जाता है लड़का लड़की को भगा ले गया। महिला प्रधान बनती है तो उसका पति अपने को "प्रधान पति" का ओहदा दे देता है और गाँव की बागडोर सम्हाल लेता है। 

हम नहीं जानते प्यारे शहर वालों, कि तुम्हारी दुनिया कैसी होती है। लेकिन इतना जानते हैं कि तुम्हारी तरह बन जाने की होड़ में कहीं हमारा रहा सहा भी न नदारद हो जाए।

हमें तुमसे कोई बैर नहीं है। हमने तुमसे बहुत कुछ सीखा है। बल्कि हम भी कभी तुम ही न बन जाएँ -- तुम भी तो कभी गाँव ही रहे होगे। 

और वैसे भी, हम दोनों उन दो भाइयों की तरह हैं जो हिंदुस्तान के इस घर के अगल बगल कमरों में रहते हैं। हमारा कमरा तुमसे तीन गुना बड़ा है लेकिन अब तक तुम्हारे पास माल-मत्ता ज्यादा था इसलिए तुम आगे थे। अब सोच रहे हैं कि हमारी इस दीवार में एक रोशनदान बनवा लें। तुम भी कभी कभी झांको, हम भी कभी कभी झांकें। तुम भी कभी कभी हमारे यहाँ बनते खाने की महक सूंघो, हम भी कभी तुम्हारी बातें सुनें। लेकन ये कभी न भूलें कि तुम्हारी नक़ल करके हमारा भला नहीं होना है -- हमारा भला खुद को और भी बदलने में है।

No comments:

Post a Comment