Tuesday 5 February 2013

ग्रामीण सरोकारों से दूर हो रहा सिनेमा : जयदीप साहनी


ग्रामीण सरोकारों के लिए बहुत कम जगह रह गई है। सप्ताहांत कमाई के फेर में पड़े निर्माताओं को ग्रामीण परिवेश की संजीदा कहानियों से कोई लेना.देना नहीं है। फिल्मी मनोरंजन के जरिए हंसी के नाम पर फू हड़पन बेचा जा रहा है। ऐसे में अगर गाँवो को बड़े पर्दे पर वापस लाना है तो ग्रामीण युवाओं को ही आगे आना होगाए ताकि 'मदर इंडिया' और 'दो बीघा जमीन' जैसी फिल्में दोबारा बन सकें। सिनेमा से गायब हो रहे गाँवों के बारे में बॉलीवुड के पटकथा लेखक और निर्देशक जयदीप साहनी से स्नेहवीर गुसाईं और सम्राट चक्रवर्ती ने विस्तार से बातचीत की।

जयदीप साहनी
जयपुर। एक समय था जब सिनेमा के पर्दे पर भारत का गाँव दिखाई देता था, वहां का पहनावा, वहां के रीतिरिवाज वहां की विविधता और वहां की समस्याएं भी दिखाई देती थीं। मगर बदलते वक्त ने देश की 70 प्रतिशत आबादी को बड़े पर्दे से गायब सा कर दिया। मॉल और मल्टीप्लेक्स कल्चर ने फिल्मों की विषय वस्तु पर गहरा असर छोड़ा है। आजकल फिल्मों में सस्ते और कमाऊ मनोरंजन की होड़ लगी है जिसमें गाँव और इससे जुड़े विषयों के लिए कोई जगह नहीं। अपनी फिल्म वेलकम.टू.सज्जनपुरश्  रिलीज होने के वक्त श्याम बेनेगल ने कहा था कि फि ल्म इंडस्ट्री कई सालों से गाँव नहीं गई। हाल के वर्षों की फि ल्मों को देखकर तो ये कहा जा सकता है कि गाँव फि ल्मों से विलुप्त हो चुके हैं। अगर कहीं बचे भी हैं तो बहुत दयनीय स्थिति में हैं। इसकी वजह ये है कि ज्यादातर फिल्मों का बिजनेस मल्टीप्लेक्स से आने लगा है। इन जगहों पर टिकटें महंगी है प्रोड्यूसर की कमाई यहां से ज्यादा होती है। तो ये एक व्यापारिक कारण है कि शहरी पृष्ठभूमि से जुड़ी या मल्टीप्लेक्स कल्चर पर आधारित फिल्मों की फंडिंग ज्यादा होती है। इसके बनिस्पत जो फि ल्में गाँवों से जुड़ी है और वास्तविक हैं उनमें कॉरपोरेट को ज्यादा रुचि नहीं होती और इस प्रकार की फिल्में अप्रूव नहीं होती और इन्हे फंडिंग नहीं मिल पाती। दूसरी वजह ये है कि जो लोग फि ल्में बनाते हैं वो शहरी लोग हैंए मुंबई के महंगे इलाकों में रहते हैंए उन्हें दूर-दूर तक अंदाजा नहीं है कि गाँव आखिर होता कैसा है। उनके लिए वही गाँव है जो फिल्मों में दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ ए टीवी में देश के अलग.अलग हिस्सों से लेखक आ रहे हैं मगर असली गाँव वहां भी नहीं दिखाया जा रहा। यदि किसी धारावाहिक में प्रांतीय पुट होता है तो भी भाषा पूरी तरह से प्रांतीय नहीं होती। यहां समस्या ये होती है कि व्यापारिक कारणों से निर्माता उसे सार्वभौमिक बनाना चाहते हैं। जिसके कारण भाषा में मात्र प्रांतीय कलेवर रह जाता है उसका मूलरूप कभी पर्दे पर नहीं उतर पाता। भाषा को बिना भ्रष्ट किए पेश करना एक कला है जो वक्त मांगती हैए इसलिए टीवी इंडस्ट्रीए जहां कन्वेयर बेल्ट की तरह चीजें चलती हैए उससे यह उम्मीद करना बेकार है। कॉरपोरेट जुड़ाव से जहां फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में काम का स्कोप बढ़ा हैए वहीं इस तरह के साइड इफेक्ट भी देखने को मिले हैं। जहां तक सिनेमा की बात है तो आजकल एंटरटेनमेंट डिस्पोज़ेेबल हो गया हैए जहा फि ल्में सिर्फ  पहले हफ्ते में पैसा कमाने के लिए बनाई जा रही हैं। मार्केटिंग को विषय वस्तु से ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। निर्माता फिल्मी सितारों पर पैसा खर्च करते हैंए राइटिंग में पैसा खर्च नहीं करतेए इसलिए अच्छी लिखाई नहीं होती। दिल ही दिल में उन्हें पता होता है कि कहानी के मामले में फि ल्म कहीं नहीं ठहरतीए इसलिए फि ल्म को इवेंट बना दिया जाता है। ऐसे में चारा यही बचता है कि इतना शोर मचाया जाए कि कम से कम शनिवार और इतवार को दर्शक सिनेमा हॉल में आ जाएं। 

अच्छी फिल्म बनाने के लिए लेखक को अपने कैरेक्टर से प्यार होना चाहिए। मेनस्ट्रीम सिनेमा एक मोटी निब वाला पेन है यहां बारीकियों के लिए जगह नहीं है। इसलिए यदि एक लेखक के तौर पर आपको बारीकियों को निखारना है चाहे वह किरदार की बारीकी हो या सब्जेक्ट की, उन्हें गहराई के साथए सोच कर तैयार करना होगा। आप चाहे स्वतंत्र लेखन शुरु करें या किसी राइटिंग स्कूल चले जाएंए आपको सिर्फ  फिल्म मेकिंग के टूल और इसके क्राफ्ट की समझ मिलेगी पर मूल आइडिया तो आपका ही होगा। अगर कोई तासीर से लेखक नहीं है तो कोई फि ल्म स्कूल उसे लेखक नहीं बना सकता। बॉलीवुड में अगर अच्छी फिल्मों की कमी है तो इसमें दर्शकों और निर्माताओं दोनों की ही गलती है। एक अच्छी स्क्रिप्ट को मसालेदार बनाने के लिए कई चीजें उसमें मिलाई जाती हैं। इस पूरी मिलावट के बाद कभी स्वाद निखर जाता है, कभी पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है। इस सब बातों को देखकर कहा जा सकता है कि मार्केटिंग फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। फिल्में बाजार के लिए ही बनाई जा रही हैं बाजार को ही परोसी जा रही हैं। ऐसे में ग्रामीण सरोकारों के लिए बहुत कम स्कोप रह गया है। सप्ताहांत कमाई के फेर में पड़े निर्माताओं को ग्रामीण परिवेश की संजीदा कहानियों से कोई लेना.देना नहीं है। फि ल्मी मनोरंजन के जरिए हंसी के नाम पर फूहड़पन बेचा जा रहा है। ऐसे में अगर गाँवों को बड़े पर्दे पर वापस लाना है तो ग्रामीण युवाओं को ही आगे आना होगा, ताकि  'मदर इंडिया' और 'दो बीघा जमीन' जैसी फिल्में दोबारा  बन सकें।

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