
भारत में खैरात बांटने की परम्परा कोई नई नहीं है। कहते हैं महाराजा हर्षवर्धन समय-समय पर अपनी प्रजा में अपना सबकुछ बांट देते थे और अपने लिए कपड़े अपनी बहन राज्यश्री से मांग कर पहनते थे। लेकिन वह जमाना दूसरा था जब राज्य और सम्पत्ति पर राजा का पूर्ण स्वामित्व रहता था। अब राज्य की सम्पत्ति पर प्रजा का अधिकार है और चुने हुए प्रतिनिधियों को भी प्रजा की सम्पत्ति का मनमानी खैरात के रूप में बांटना उचित नहीं प्रतीत होता। यदि सेठ साहूकार अपनी निजी सम्पत्ति को खैरात में बांटें तो बात अलग है।
ओडीशा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने लैपटाप बांटे हैं, ओडीशा में छाते बांटे जा रहे हैं, इसके पहले तमिलनाडु में टीवी और कम्प्यूटर बंट चुके हैं और आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में साइकिलें बांटी जा चुकी हैं। स्कूलों में किताबें, कापियां बांटना, वजीफा देना, फीस माफ करना तो समझ में आता है परन्तु महिलाओं को साडिय़ां, बच्चों को स्कूल ड्रेस, दोपहर का भोजन बांटने का मतलब है अभी भी समाज नंगा और भूखा है। कई बार बच्चे घर से इसलिए भूखे भेज दिए जाते हैं कि वहां तो खाना मिलेगा ही, अभिभावक बच्चे की ड्रेस इस उम्मीद में नहीं बनवाते कि सरकार तो ड्रेस बांटेगी ही। समाज में ऐसी मानसिकता पैदा करना जो खैरात की उम्मीद में उद्यमशीलता बन्द करा दे, उचित नहीं।
कई सरकारें किसानों द्वारा बैंक से लिया गया कर्जा माफ कर देती हैं इससे कर्जा चुकाने का संकल्प कमजोर पड़ता है। चुनावी वादे पूरा करने के लिए मुफ्त में बिजली और पानी की आदत डाल दी जाती है। किसान समझ सकता है कि कटिया लगाकर ले लो, बिजली तो मुफ्त की है। कभी सोचा है कि बैंकों का मूलधन और बिजली पानी की लागत किसके द्वारा चुकाई जा रही है।
सरकारें कई बार एक रुपया प्रति किलो के हिसाब से चावल या गेहूं गरीबों को बेचती हैं जो लागत मूल्य से बहुत कम होता है तो इनका लागत मूल्य कौन देता है। ऐसा नहीं कि मजदूर राशन खरीद नहीं सकता इसलिए सस्ता करना ज़रूरी है। 1972 में जब मजदूरी दो रुपया प्रतिदिन थी तो गेहूं एक रुपए में डेढ़ किलो बिकता था यानि मजदूर शाम को तीन किलो गेहूं घर लाता था। अब मजदूरी 120 रुपया प्रतिदिन है और गेंहू 15 रुपया प्रति किलो है यानि वही मजदूर अब 8 किलो गेहूं घर लाता है। सरकार चलाने वाली पार्टियां खैरात देकर बदले में वोट चाहती हैं लेकिन वोटर को सोचना चाहिए कि वह खैरात के रूप में हलाल की रकम ले रहा है या फिर हराम की। स्वाभिमानी शिक्षित बेरोजगार भी एक हजार रुपए प्रतिमाह का बेरोजगारी भत्ता लेने के लिए खैरात की लाइन में लग जाते हैं, शायद यह लाइन नौकरी दिला दे।
बेरोजगारी भत्ते का मतलब है कि कोई व्यक्ति काम करने की क्षमता रखता है परन्तु सरकार या समाज के पास काम नहीं है। उदाहरण के लिए आप शिक्षित हैं और आपको टाइपिंग, कम्प्यूटर डाटा इंट्री, सर्वे करना आदि आता है अथवा साइकिल बनाना, मोटर मकैनिक, कारपेन्टरी, लोहारगीरी, राजगीरी, पुताई अथवा, सिलाई आती है परन्तु समाज या सरकार काम नहीं दे पा रही है तो आप बेराजगारी भत्ते के हकदार हैं। परन्तु अगर खैरात की रकम में गुजारा करना सीख लिया तो बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करना भूल जाएंगे।
विदेशों में भी बेरोजगारी भत्ता मिलता है। इसकी पात्रता के लिए इस बात का प्रमाणपत्र देना होता है कि आप रोजगार में थे और बेरोजगार हो गए। उदाहरण के लिए आप किसी बैंक में काम कर रहे थे बैंक दिवालिया हो गया आप की नौकरी चली गई, जिस दुकान पर काम कर रहे थे वह बन्द हो गई, माल न बिकने से कारखाना बन्द हो गया और छटनी में नौकरी चली गई, कोई योजना का समय निर्धारित था और योजना पूरी होने के बाद आप की रोजी चली गई तब बेरोजगारी भत्ता आप का अधिकार बनेगा, खैरात नहीं। ऐसी परिस्थिति में सम्मानजनक मानदेयक मिलना चाहिए जब तक नया रोजगार न मिल जाए।
अच्छी बात है कि उम्रदराज लोगों और विधवाओं को गुजारा करने के लिए सरकार ने पेंशन की व्यवस्था की है। बेरोजगार मेहनतकश नौजवानों को मनरेगा के अन्तर्गत साल में 100 दिन की मजदूरी मिल रही है। यदि शिक्षित बेरोजगारों को खैरात से बचाना है तो उचित होगा कि ग्राम प्रधान अपनी पंचायत में रोजगार के अवसर पैदा करें। शिक्षित बेरोजगारों का चयन प्रधान करें और वेतन भी वही दें जैसे मनरेगा वालों को देते हैं। ऐसी दशा में दिया गया मानदेयक पारिश्रमिक बन जाएगा खैरात नहीं होगा और भत्ता कम से कम मनरेगा के समान होगा।
देश की युवाशक्ति में स्वाभिमान को जगाने की ज़रूरत है कि वे खैरात की नहीं काम की मांग करें। अपनी योग्यता और क्षमता के हिसाब से काम और काम का पूरा दाम। शिक्षित बेरोजगारों को मनरेगा से भी कम मानदेय देना उनका अपमान है। आशा है हमारी सरकार व्यावहारिक दृष्टिïकोण अपनाते हुए बैंकों से भ्रष्टाचार और दफ्तरों से बाबूगिरी कम करके ग्रामीण युवाओं को उद्यमशील और स्वाभिमानी बनाने का प्रयास करेगी। वे अपना रोजगार स्वयं खड़ा कर लेंगे।
ऑपरेशन ब्लू स्टार : पढ़िए, स्वतंत्र भारत में असैनिक संघर्ष की सबसे खूनी लड़ाई का पूरा किस्सा
ReplyDeleteऑपरेशन ब्लू स्टार को आज 36 बरस हो गए। 1984 में पंजाब के हालात आज के कश्मीर के जैसे थे। प्रदेश में अस्थिरता पैदा करने की जोरदार कोशिश हो रही थी। पंजाब पुलिस के डीआईजी एएस अटवाल की हत्या कर दी जाती है। जालंधर के पास बंदूकधारियों ने पंजाब रोडवेज की बस रुकवाकर उसमें बैठे हिन्दुओं को चुन-चुनकर गोली मार दी। विमान हाईजैक कर लिया गया। पंजाब की स्थिति बेकाबू हो चुकी थी इसलिए केंद्र की सत्ता में बैठी इंदिरा गांधी ने वहां कि सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया।
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