फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से तो करोड़ों लोग जुड़े हैं जो शहरों तक ही सीमित हैं, लेकिन झारखंड के गाँवों के लोग मोबाइल रेडियो से एक दूसरे के संपर्क में लगातार रहते हैं। बता रहे हैं मनीष मिश्र:
पलामू (झारखंड)। हैलो... झारखंड मोबाइल रेडियो में आप का स्वागत है। अगर आप इस आइटम को नहीं सुनना चाहते हैं तो अगला आइटम सुनने के लिए दबाएं नंबर-1, अगर आप किसी भी आइटम पर अपनी राय देना चाहते हैं तो दबाएं नंबर-2 और अपने समुदाय से जुड़ी बात बताने के लिए दबाएं नंबर-3। कुछ ऐसा ही सुनने को मिलता है जब एक खास नंबर पर गाँव के लोग कॉल करते हैं। गाँव के हजारों-लाखों लोगों को आपस में जोडऩे वाला यह खास नंबर है झारखंड मोबाइल रेडियो का। 'गूँज' नाम की इस पहल के जरिए लोग बिना किसी सोशल नेटवर्किंग साइट की मदद से जुड़े रहते हैं।
झारखंड मोबाइल रेडियो के फाउंडर मेंबर और आईआईटी दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर आदितेश्वर कहते हैं, "मैं सोचता था कि ग्रास रूट लेवल पर लोगों की आवाज कैसे बना जाए, काम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए काफी अधिक फीस की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके लिए कोई फीस नहीं देनी पड़ती। साथ ही, मोबाइल रेडियो के लिए कोई भी कहीं से कॉल कर सकता है, लेकिन काम्युनिटी रेडियो की सीमा मात्र 15 किमी ही होती है।'
''ग्रामवाणी के कार्यक्रम के तहत चल रहे इस झारखंड मोबाइल रेडियो के नंबर पर कॉल करके लोग अपने गाँव की समस्या लोगों के सामने रख सकते हैं, वह भी खुद की ही आवाज में। इतना ही नहीं यह गाँव के लोगों के लिए मनोरंजन का साधन भी है। इसमें लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सुने जा सकते हैं।'' राकेश कुमार (38) बताते हैं। राकेश झारखंड मोबाइल रेडियो के रीजनल मैनेजर हैं। वह आगे कहते है, ''झारखंड मोबाइल रेडियो के नंबर पर कहीं से भी कॉल की जा सकती है। इसका उद्ेश्य है गाँव के लोगों की आवाज बुलंद करना।''
साथ ही, इसका भी विशेष ध्यान रखा जाता है कि खुला मंच मिलने का मतलब यह नहीं कि कोई किसी के लिए कुछ भी बोल दे। ''अगर कोई किसी पर आरोप लगाता है तो मॉडरेटर उसे रोक देता है और जिस पर आरोप लगाया जाता है, उससे बात करके कि उसका पक्ष क्या है उसके बाद दोनों की बात को एकसाथ आगे प्रसारण के लिए भेजा जाता है।'' राकेश कुमार बताते हैं। वह आगे कहते हैं,''अगर कोई किसी के लिए अपशब्द बोलता है या बुरा-भला कहता है तो उसे मॉडरेटर सुन के रोक देता है।'' इस मोबाइल रेडियो स्टेशन पर अपनी बात ही बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी पा सकते हैं, लोकगीत भी सुन सकते हैं। इतना ही नहीं अगर किसी ने अपनी बात कही है तो उसे मोबाइल पर मैसेज के जरिए बताया जाता है कि आप की बात प्रसारण के लिए भेज दी गई है और उसे सुन सकते हैं।
इस स्टेशन पर पहली बार कॉल करने वालों को प्रोत्साहित किया जाता है ताकि उनका उत्साह कहीं से कम न होने पाए। ''अगर कोई पहली बार कॉल करता है, और उसे अगर थोड़ी हिचकिचाहट महसूस होती है तो मॉडरेटर उसे एडिट कर देते हैं, उसके बाद ही उसे प्रसारण के लिए भेजा जाता है। फिर वापस कॉल करने वाले के पास फोन करके कहा जाता है, 'आप ने काफी अच्छा बोला'। ताकि बालने वाले का उत्साह न कम होने पाए। इसे बूस्ट कॉल कहते हैं।'' राकेश बताते हैं।
गाँव-गाँव तक झारखंड मोबाइल का नंबर लोगों तक पहुंचाने के लिए लोकल एनजीओ और स्वयं सेवकों की मदद ली जाती है। ये स्वयं सेवक गाँवों में जाकर लोगों से बात करते हैं और उनकी बात मोबाइल स्टेशन तक पहुंचाते हैं। महीने में एक बार मॉडरेटर, स्वयं सेवकों की मीटिंग बुलाई जाती है। जिसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जाता है।
अभी रोज 10 घंटे, सुबह 7 से 12 और शाम 4 से 9 बजे तक चलने वाले इस मोबाइल रेडियो स्टेशन को जल्द ही 24 घंटे जारी रखने की योजना है।
''झारखंड में इस मोबाइल रेडियो की सफलता के बाद अब उत्तर प्रदेश समेत अन्य दूसरे राज्यों में शुरू करने का सोच रहे हैं। इस मोबाइल रेडियो में सबसे ज्यादा कॉल्स कस्बों और गाँवो से आती हैं।'' अदितेश्वर बताते हैं।
गाँवों तक जानकारी पहुंचाते हैं स्वयंसेवक और एनजीओ
झारखंड मोबाइल रेडियो का नंबर गाँव में लोगों तक पहुंचाने के लिए स्वयंसेवकों और एनजीओ का सहारा लिया जाता है। ये लोग गाँव-गाँव जाकर लोगों से बात करते हैं और अपने सामने ही पहली बार लोगों की मोबाइल पर बात कराते हैं। यहां काम करने वाले स्वयंसेवी उमेश कुमार तुरी (30) ने अभी करीब चार पांच लोगों को ही जोड़ा है। वह कहते हैं,"मुझे किसी ने इसके बारे में बताया था फिर मैंने इसके बारे में पता किया तो अच्छा लगा। मैं गाँवों में जाकर लोगों को इसके बारे में बताता हूं।" वह आगे बताते हैं, "जब पहली बार फोन लेकर उनके पास जाता हूं तो उन्हें थोड़ी हिचकिचाहट होती है, लेकिन वह भरोसा यूं कर लेते हैं कि किसी पत्रकार से बात करने में उसे बताना पड़ता है और जो वह लिखे, लेकिन इस मोबाइल रेडियो में उनकी खुद की ही आवाज होती है। यह स्वयंसेवी गाँवों में जाकर लोगों को जागरुक करते हैं। उमेश कहते हैं,"हम लोग गाँवों में नुक्कड़ नाटक, दीवारों पर लिखना, चौपाल आदि करते हैं इसके लिए, फिरे उन्हें बताया जाता है कि यह उनकी जिंदगी को कैसे फायदा पहुंचा सकता है।"
गाँवों में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है, उमेश कहते हैं, " इस रेडियो के माध्यम से लोगों को हर तरह की जानकारी मिलती है, उन्हे कामकाज, सरकारी खबरें, गाँव के राशन की दुकान में हो रहा घोटाला, और गीत संगीत भी सुनने को मिलता है। कोशिश होती है कि गाँवों की समस्याओं को जिम्मेदार अफसरों तक पहुंचाया जाए। जरूरत पडऩे पर रिकॉडिंग भी सुनाई जाती है।"
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