Monday, 3 June 2013

भद्रक में सीआईआरसी से लोगों को बड़ी उम्मीदें


ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 144 किलोमीटर दूर भद्रक नाम का एक ऐसा जिला है, जो मुगल तमाशा के लिए मशहूर है। इस अनोखी कला को हिन्दू एवं मुसलमान संप्रदाय के कलाकार खास अंदाज में पेश करते हैं, जो उनकी रोजी रोटी का ज़रिया भी है।  

इसी जिले का एक छोटा सा हमनाम शहर भद्रक संप्रदायिक सदभाव राज्य के लिए ही नहीं देश के लिए भी एक मिसाल है। साल 1992-93 को अगर छोड़ दें तो 1947 के बाद कोई ऐसा साल नहीं होगा, जब वहां के लोगों को किसी संप्रदायिक दंगे का शिकार होना पड़ा हो। शायद इसकी बड़ी वजह यह है कि छोटे से शहर में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी में ज्यादा अंतर नहीं है। 

भद्रक शहर में जहां मुसलमानों की आबादी 51 फीसदी है तो वहीं 49 फीसदी हिंदू हैं। साथ ही वहां कुछ ऐसे धार्मिक और स्वनिर्मित किस्म के संगठनों की कोशिश का नतीजा भी है जो आजादी से लेकर आजतक मुसलमानों और हिंदूओं की नुमांइदगी करते हुए संप्रदायिक सदभाव बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहे हैं। 
इसका साफ  उदाहरण भद्रक शहर की गलियों में नजऱ आता है। जहां सड़कों के किनारे ग्राहक के इंतजार में दर्जी के रूप में सिलाई मशीन के साथ बैठे कई मुस्लिम समुदाय के लोग मिल जाएंगे जो आर्थिक तंगी की वजह से हर रोज कड़ा संघर्ष करने को मजबूर है। 

इलाके में एक सर्वे में हमने पाया कि मुस्लिम समुदाय के ज्य़ादार लोग या तो कृषि पर निर्भर हैं या फि र सिलाई या छोटा बिजनेस कर अपना जीवनयापन करते हैं। अगर एक-दो परिवार को छोड़ दें तो हम पाते हैं कि इस समुदाय के लोगों के पास इसके अलावा कोई दूसरा रोजगार नहीं है। इसकी मुख्य वजह स्थानीय लोगों में शिक्षा की कमी। वैसे तो भद्रक शहर में साक्षरता की दर 80 फीसदी है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में ये दर काफी कम करीब 40 फीसदी है। अगर, कोई मुसलमान परिवार शिक्षित है तो उसे कंप्यूटर या तकनीकी ज्ञान नहीं है। 21वीं सदी के इस तकनीक युग में किसी वर्ग को कंप्यूटर की जानकारी न होना, उसकी धुंधले भविष्य को दर्शाने के लिए काफी है। 

इसी कड़वी सच्चाई और हालात को और करीब से समझने के लिए हमने इस्राइल मियां नाम के एक ऐसे शख्स से बात की, जो करीब 10 साल से सड़कों के किनारे सिलाई कर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। इस्राइल मियां ने अपनी हालत बयान करते हुए कहा कि वो और उनके परिवार की सभी महिलाएं कई सालों से इस काम को करते आ रहे हैं, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई काम नहीं है। ये पूछे जाने पर कि इतनी गर्मी में सड़क के किनारे कैसे काम करते हो, इस्राइल मियां कहते हैं, ''काम तो काम है, चाहे जिस हालात में करना हो, पेट के लिए करना ही पड़ेगा।"

इस इलाके में इस्राइल मियां जैसे ज्यादातर मुसलमान ऐसी ही गरीबी की मार झेल रहे हैं, जिसकी सिर्फ  और सिर्फ  एक वजह है, अशिक्षा और सूचना का आभाव। यूं तो शिक्षा किसी भी समुदाय के विकास के लिए अहम है। लेकिन, दूर्भाग्यवश आज मुसलमानों के पिछड़ेपन की असल वजह भी शिक्षा ही है। मुसलमानों के शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक हालात को सुधारने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के तमाम कोशिशें भी मुसलमानों की हालात सुधारने में अब तक ना काफ़ ी साबित हुए हैं।  स्थानीय संगठन और संस्थाएं भी भारत के मुसलमानों की कितनी हमदर्द हैं, इसका अंदाजा ऊपर बयान की गई हकीकत से लगाया जा सकता है।

खुद को मुसलमानों की खरख्वाह बताने वाली मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी 50 वर्षों में चाहे शादी के लिए एक मॉडल निकाहनामा भी तैयार न कर सका हो लेकिन वो हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी राय से जरूर नवाज़ता है। यही नहीं, पर्सनल लॉ बोर्ड तमाम बच्चों के लिए शिक्षा को बुनियादी अधिकार में शामिल करने जैसे अहम सरकारी कदमों का भी धर्म के नाम पर विरोध कर चुका है।

इसी कमी को पूरा करने के मकसद से डिजिटल एंपावरमेंट फ ाउंडेशन ने स्थानीय संस्था दिशा के सहयोग से भद्रक में एक ऐसे 'सामुदायिक सूचना संसाधन केंद्र' की स्थापना की है जहां न सिर्फ मुसलमानों को नई तकनीकी शिक्षा दी जाएगी, बल्कि समाज के गरीब और अशिक्षित युवाओं, महिलाओं को हर तरह की सूचनाएं दी जा सकेंगी ताकि वो अपना भविष्य तलाश सकें।

इस सामुदायिक सूचना संसाधन केंद्र यानि 'सीआईआरसी' में मासिक कंप्यूटर एवं इंटरनेट कोर्स के अलावा कई ऐसी वोकेशनल ट्रेनिंग की भी सुविधा है, जिसे प्राप्त कर इलाके की महिलाएं और पुरुष एक नया रोजगार पा सकेंगे।

साथ ही सीआईआरसी कई ऐसी डिजिटल सर्विसेज यानि प्रिंटिंग, टिकट बुकिंग, स्कैनिंग, स्काइप, फेसबुक जैसी सुविधाओं से भी लैस है जो इलाके को नॉलेज कॉम्यूनिटी में तब्दील करने के साथ-साथ स्थानीय लोगों को दूसरी दुनिया से भी जोड़ सकेगा।

28 मई 2013 को स्थानीय जिला कलेक्टर श्री लक्ष्मी नारायण मिश्रा ने भी सीआईआरसी केंद्र का उद्घाटन के दौरान इसकी अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि समाज के पिछड़े वर्ग को मुख्य धारा से जोडऩे के लिए सूचना केंद्र एक अहम रोल अदा कर सकता है। 

गाँवों या छोटे शहरों के 15 से 30 फीसदी मुसलमान के बच्चे आज भी अपनी पहली पढ़ाई मकतब से शुरू करते हैं, जहां उन्हें किसी प्रकार की तकनीकी शिक्षा नहीं मिलती। सच्चर कमेटी रिपोर्ट भी ये खुलासा कर चुकी है कि 4 फ ीसदी मुस्लिम बच्चे आज  भी फुलटाइम सिर्फ मदरसों में ही पढ़ते हैं।

ऐसे हालात में हमें बड़ी संजीदगी से मुसलमानों के हालात पर गौर करना होगा। आंकड़ों के मुताबिक भारत में ज्यादातर मुसलमान गऱीब किसान या छोटे कारोबारी है जो अपने बच्चों को मदरसों में ही पढऩे भेज सकते हैं। ऐसे में अगर हम पुरानी शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक नहीं बनाएंगे या उन्हें नई तकनीकी शिक्षा से लैस नहीं करेंगे, तब तक वो बाहरी दुनिया से बराबरी नहीं कर सकते और ना ही वो विकास की मुख्यधारा से कभी जुड़ सकेंगे।
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि इन इलाकों में अब ऐसी सुविधा प्रदान की जाएं ताकि वहां के गरीब बच्चे आसानी से अपनी जरूरत के मुताबिक सूचना हासिल कर सकें और नई तकनीकी शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग से इतना परिपक्व हो जाएं कि वे आसानी से अपनी योग्यता के अनुसार अलग-अलग रोजगार पा सकें। 
(लेखक डिजिटल एंपावरमेंट फ उंडेशन के संस्थापक निदेशक और मंथन अवार्ड के चेयरमैन हैं। वह इंटरनेट प्रसारण एवं संचालन के लिए संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कार्य समूह के सदस्य हैं और कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए बनी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी  के सदस्य हैं।)

Sunday, 2 June 2013

महिलाओं के सामूहिक प्रयास ने बनाया 'अप्पन समाचार'

अमृतांज इंदीवर

 पारू (मुजफ्फरपुर, बिहार)। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड की ग्रामीण लड़कियों ने सामुदायिक चैनल 'अप्पन समाचार' (ऑल वुमेन न्यूज चैनल) चला कर इस मिथक को तोड़ दिया है कि बड़ी पूंजी व सेटअप के बगैर मीडिया संस्थान चलाने की बात सोची नहीं जा सकती हैं। रिंकू कुमारी, खुशबू कुमारी, अनिता, पिंकी, सविता, ममता, रेणु, जुबेहा खातून, प्रियंका समेत करीब डेढ़ दर्जन लड़कियां पैसे के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के लिए मेहनत कर रही हैं। इन्होंने गाँवों की समस्याओं और सामाजिक बुराइयों की तस्वीर उतार कर लोगों के हृदय में अपनी जगह बनायी है। 

अप्पन समाचार का कार्यालय जिले के सुदूर पश्चिमी दियारा इलाके के नारायणी नदी के किनारे स्थित है। यह एक ऐसा गाँव है, जहां अधिकारी भी जाने से कतराते हैं। इस इलाके में वर्षों से अपराधियों का वर्चस्व रहा है। आज नक्सलियों की चहलकदमी है। गरीबी, अशिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी का दंश झेल रहा है यह इलाका। आसपास के दर्जनों गाँव अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों में जकड़े हंै। इस घटाटोप में एक नयी रोशनी फैलाने के मकसद से सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार संतोष सारंग ने अप्पन समाचार की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया। उन्होंने अपने कुछ साथियों की मदद से गांव की दर्जनों ठेठ देहाती लड़कियों को कैमरे व खबरों की बारिकियों से अवगत कराकर घर की देहरी से बाहर निकाला। इस तरह चल पड़ा अपना चैनल यानी 'अप्पन समाचार'। 

इस अनूठे चैनल की स्टार रिपोर्टर पिंकी, अनिता का सानी नहीं है। पूरे हौसले और जज्बे के साथ साइकिल से गाँव की गलियों व टोले-कस्बों में खुशबू, पिंकी, अनिता, ममता आदि रिपोर्टिंग को निकलती हैं। सबसे बड़ी बात है कि इस चैनल में रिपोर्टर से लेकर कैमरापर्सन, वीडियो एडिटर और एंकर सभी गांव की बेटियां हैं। खेत-खलिहान और बाग-बगीचे इनके स्टूडियो और साइकिल ओवी वैन हैं। अप्पन समाचार की शुरुआत मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड के रामलीलागाछी (चांदकेवारी) में 6 दिसंबर 2007 को हुई था। एक गाँव से शुरू हुआ यह चैनल जिले के पारू, साहेबगंज, सरैया, मड़वन और मुशहरी प्रखंडों के दर्जनों गांवों को कवर करता है। अप्पन समाचार का बुलेटिन 45 मिनट का होता है, जिसे गाँव के हाट-बाजार (पेठिया) और टोले-कस्बों में प्रोजेक्टर और पोर्टेबल टेलीविजन के जरिये दिखाया जाता है। रामलीलागाछी, डुमरी, धरफरी, खेमकरना, साहपुर, देवरिया, सरैया, पकड़ी पकोही, भगवानपुर सहित दर्जनों जगहों पर गांवों की समस्याओं की स्क्रीनिंग होती है, जहां सैकड़ों लोग इकट्ठे  होकर देखते हैं। इस 45 मिनट की बुलेटिन में गाँवों व किसानों की समस्याएं, महिला उत्पीडऩ, सामाजिक बुराइयां, पंचायती राज में भ्रष्टाचार, पर्यावरण, कानून व अधिकारों की जानकारी से संबंधित करीब 7-8 खबरें होती हैं। 

मिशन आई इंटरनेशनल सर्विस 'अप्पन समाचार' से जुड़ी ग्रामीण लड़कियों को मीडिया वर्कशॉप के जरिये पत्रकारिता की बेसिक जानकारी दे रही है। सोशल मीडिया व वेब मीडिया के बारे में भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। इधर, अप्पन समाचार ने महिला समाख्या के सहयोग से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्राओं को नागरिक पत्रकारिता का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। मुशहरी, मड़वन, कांटी, बोचहां, गायघाट, सकरा, कटरा, बंदरा, कुढऩी, मीनापुर, मुरौल, औराई आदि प्रखंडों की करीब 1000 से भी अधिक छात्राएं मीडिया लिटरेट बन रही हैं। कैमरा, ट्राइपोड संभाल रही हैं। 

इधर, अप्पन समाचार ने चैनल के साथ मासिक चिंता भी निकालना शुरू किया है। चिंता पाठक गाँव की महिलाएं, मजदूर, स्कूली बच्चे व किसान हैं। जो खबरें चैनल पर चलती हैं, वही खबरें चार पन्नों के मासिक चि_ा में छपती हैं। एक ही स्क्रिप्ट को विजुअल और प्रिंट दोनों में शामिल किया जाता है।  चिंता की संपादक रिंकु कुमारी हैं और सहायक संपादक खुशबू कुमारी। जबकि अप्पन समाचार चैनल में रिंकु कुमारी निर्माता और खुशबू बतौर एंकर की भूमिका निभाती हैं। 

अप्पन समाचार में ग्रामीणों की आवाज को काफी तव्वजो दी जाती है। इसका प्रभाव भी गाँवों से लेकर प्रखंड कार्यालयों तक दिखता है।। चांदकेवारी स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय का भवन निर्माण दो-तीन नंबर ईंट से हो रहा था। अप्पन समाचार ने इस पर स्टोरी दिखाई, तो प्रधानाध्यापक को ईंट वापस करनी पड़ी। धरफ री स्थित ग्रामीण बैंक में किसानों से केसीसी के लिए रिश्वत ली जा रही थी। अप्पन समाचार टीम ने स्टोरी की, तो इसका फायदा करीब दो दर्जन किसानों को मिला। पंचायत के सोहांसी निवासी गरीब फ गुनी महतो का पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज था। उसे राशन-केरोसिन नहीं मिल रहा था। पास में ही पंचायत के मुखियाजी का घर भी है। उन्हें इस परिवार की माली स्थिति पर तरस नहीं आ रही थी। अप्पन समाचार की स्टोरी से उस परिवार को मदद मिली। अप्पन समाचार के संस्थापक संतोष सारंग सामाजिक बदलाव के लिए डिजिटल टूल्स को माध्यम बनाया है। इसका मकसद है गाँव की लड़कियों व महिलाओं को सशक्त करना। उनके अंदर मीडिया की समझ डालकर सामाजिक बुराइयों को दूर करना, पर्यावरण को लेकर जागरूकता पैदा करना, कल्याणकारी योजनाओं में गड़बडिय़ों को उजागर करना आदि। चैनल से जुड़ी लड़कियों को पढ़ाई के खर्च में मदद भी दी जाती है।   

पहली बार जब गाँव की चार लड़कियां खुशबू, अनिता, रूबी, रूमा हाथों में कैमरा, ट्राइपोड, माइक लेकर निकली तो लोगों ने कहा कि क्या तमाशा खड़ा़ कर दिया है। इन लड़कियों को न लाइट का पता था, न साउंड का। वायसओवर और रिपोर्टिंग से अनजान इन हाथों ने जब 45 मिनट का पहला एपिसोड रामलीलागाछी हाट में दिखाया, तो लोग देखकर आश्चर्यचकित हुए। आज इनके चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त है। इनकी लोकप्रियता केवल गाँवों में ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया में भी है। गाँव के लोगों ने उत्साहित होकर गाँव का नाम 'अप्पन समाचार ग्राम' रखा है। अप्पन समाचार टीम की मदद के लिए 11 सदस्यीय विलेज एडिटोरियल बोर्ड बनाया गया है। 

इसमें अध्यक्ष शंभूशरण सिंह व सदस्य विनोद जयसवाल, रामनाथ गुप्ता, लालबाबू राय, संजय कुशवाहा, महेन्द्र ठाकुर, संजय यादव आदि शामिल हैं। पर्दे के पीछे के हीरो राजेश कुमार, पंकज सिंह, फू लदेव पटेल व नीतीश कुमार हैं। जो तकनीकी सहयोग के साथ-साथ खबरों के लिए इनपुट जुटाते हैं। रिंकु अप्पन समाचार की टीम में शामिल होकर 2008 में कोसी की त्रासदी को कवर करने में जख्मी हो गई थीं। इन लड़कियों ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दूल कलाम का कार्यक्रम कवर किया। आज ये लड़कियां बच्चे, बूढ़े और गरीब महिलाओं की आवाज बनी हैं। गांव के लोग अप्पन समाचार से समस्याओं पर बात करते हैं और महिलाएं प्रताडऩा की दर्दभरी दास्तां सुनाती हैं। इस मीडिया क्रांति को 'एनसीआरटी' ने सातवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विज्ञान भाग-2' में 'लोकतंत्र और मीडिया' पाठ में शामिल किया है। 

अप्पन समाचार की सफ लता की कहानी को देश-दुनिया के प्रमुख अखबारों/चैनलों और न्यूज एजेंसियों ने लिखा और दिखाया है। एआरडी जर्मन टीवी ने सात मिनट की डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनायी है। बीबीसी ने भी स्टोरी प्रकाशित की। अप्पन समाचार की कहानी प्रख्यात फि ल्म निर्देशक सईद अख्तर मिर्जा की नेशनल चैनल पर प्रसारित सीरियल 'ये इंडिया है मेरी जान' के एक एपिसोड का विषय बनी है। अलजजीरा चैनल डॉक्यूमेंटरी बना रही है। अप्पन समाचार को नेटवर्क 18 ने अक्तूबर 2008 में 'सिटीजन जर्नलिस्ट अवार्ड' से नवाजा है। 2010 में वन वल्र्ड मीडिया ने इस अनोखे काम के लिए अप्पन समाचार को स्पेशल अवार्ड के लिए शॉर्टलिस्ट किया था। इस वर्ष पटना पुस्तक मेला में अप्पन समाचार की संपादक रिंकु कुमारी को 'एसपी सिंह पत्रकारिता पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है। अप्पन समाचार के काम को देखने उड़ीसा के कंधमाल से 13 आदिवासी महिलाओं एवं बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय की पत्रकारिता के 22 छात्र-छात्राओं की टीम भी आ चुकी हैं। आज यह मीडिया आंदोलन समाज के लिए नजीर बन गया है।

अब न बदली तो नहीं बचेगी कठपुतली

लखनऊ। में चारबाग की ओर जाने वाली सड़क पर दायीं ओर मुड़कर लालकुंआ भेड़ी मंडी आती है। पास ही में एक पतली गलीनुमा सड़क के एक छोर पर है वो छोटा सा कमरा जहंा एक बड़ा सपना पल रहा है। कठपुतली कला को एक नया मुकाम देने का सपना। कमरे में बिखरे तरह तरह की शक्लों के पुतले देखकर अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इन्हें पुराने अखबारों की कतरनों से बनी लुग्दी से बनाया गया होगा। कतरनें जब मेराज आलम के हाथों से कठपुतलियों की शक्लों में ढ़लती हैं तो जैसे उनमें जान आ जाती है। 

भारतेन्दु नाट्य अकादमी से नब्बे के दशक में पढ़ाई पूरी करके मेराज आलम थियेटर से जुड़ गये। अभिनय, निर्देशन सब किया लेकिन एक कसक थी कि कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। यही कोई 10 साल पहले उन्होंने कठपुतलियों पर काम करना शुरु किया। वो बताते हैं, ''मुझे लगा कि कठपुतलियों की दुनिया में नया करने की गज़ब गुन्जाइशें हैं। तबसे खुद ही कठपुतलियां बनानी शुरु की। धीरे धीरे बच्चों और बड़ों के साथ कठपुतली बनाने की कार्यशालाएं भी लेने लगा। क्यूंकि खुद ही कुछ न कुछ नया ईज़ाद करता था इसलिये बच्चों को नये और रोचक तरीके से समझा भी पाता था। वो बहुत रुचि लेते थे।"

''बच्चों को पहले कह के दूसरी दुनिया दिखाता था। उन्हें भरोसा नहीं होता था। फिर वो थर्माकॉल पर कटिंग शुरु करते थे। चीथड़ों और पुरानी चीजों को जमा करके उन्हें प्रयोग करना शुरु करते थे। और तीसरे चौथे दिन से ही जब वो अपनी ही बनाई चीजों से दुनिया को बदलते हुए देखते थे तो उन्हें यकीन हो जाता था कि जो दूसरी दुनियां जो मैं उन्हें दिखा रहा था वो सच में वजूद रखती है।" माथे का पसीना पोंछने के बाद ये कहते हुए मेराज के ज़हन में जैसे उन बच्चों का चेहरा ताजा हो जाता है। ये ताजग़ी उनके चेहरे पे भी पढ़ी जा सकती है।
पत्नी अजऱा मेराज़ झुकी नजऱों से एक बार अपने पति को देखती हैं और फि र जैसे उन्हें अपनी आंखों में रात चार बजे तक उनके आस पास बिखरा पुतलों का वो संसार याद आ जाता है, अपने पति की कठपुतलियों को लेकर दीवानगी को वो कुछ इस तरह बयां करती हैं, ''रोज रात को 2-2 बजे तक लगे रहते हैं, कभी कभी तो रात के चार बज जाते हैं पर इनका काम पूरा नहीं होता। पहले पहले गुस्सा आता था कि ऑफि स से लौटते ही ऊपर कमरे में चले जाते हैं और अखबारों, गत्तों वगैरह से खेलने लगते हैं। खाने के लिये बुलाओ तो घंटों तक नहीं आते। पर अब तो आदत हो गई है।"

अक्सर इस तरह की दीवानगी रखने वाले लोगों के पारिवारिक रिश्ते पटरी से उतरे हुए रहते हैं, लेकिन यहां मामला कुछ और है। ''कपिल देव नाम के एक कलाकर बहुत पहले लखनऊ आये थे जिन्होंने कठपुतली कला की कार्यशाला यहां लगाई। एक महीने की कार्यशाला थी। मैं तो नौकरी कर रहा था, मेरी पत्नी ने उस कार्यशाला में हिस्सा लिया। वो रोज जाती और कार्यशाला में जो भी होता आकर मुझे बताती। ऐसे मुझे भी बहुत सी जानकारियां मिल गई।" ''ये सुबह ऑफिस जाने से पहले छोड़ आते थे, और इनका ऑफिस खत्म होता था तो मुझे लेने वर्कशॉप में आ जाते थे।" अजऱा कहती हैं। 

बात का धागा जोड़ते हुए मेराज़ आलम आगे बताते हैं ''और फिर मैं कुछ देर वहीं रुक जाता था। ऐसे कुछ आधा घंटा मैं भी वर्कशॉप में शामिल हो जाता था और बांक ी दिनभर में क्या हुआ पत्नी ये मुझे बता देती थी।"
पति-पत्नी ही नहीं बल्कि इनके बच्चे भी अपने मां-बाप की इस विरासत को अपने साथ सहेजना चाहते हैं। तनय (18) और तान्या (14) दोनों अपने माता-पिता की ही तरह इस कला से जुड़कर नाम कमाना चाहते हैं। 
हांलाकि कठपुतलियों के लिये समर्पित इस परिवार की दीवानगी के आड़े पैसे ज़रुर आते हैं। इस ओर इशारा करते हुए मेराज़ कहते हैं,  '' एक ब्रश 20 से 30 रुपये का आता है, रंग लगातार महंगे हो रहे हैं। कठपुतली बनाना कितना महंगा हो गया है। ऐसे में कलाकारों की जीविका का कोई साधन बचा नहीं है। केवल भावनाओं से काम नहीं होता पैसे भी तो चाहिये"

तरह तरह से काम आई कठपुतलियां


कठपुतलियों पर कोई  खास अकैडमिक साहित्य नहीं है, हालांकि ये एक बहुरुपिणी कला है। गुलाबो-सिताबो, जाट-जाटाईन या फिर धोबी- धोबाइन के किरदार ऐसे हैं जिनकी कोई स्क्रिप्ट नहीं है, लोगों ने इन्हें सुन-सुनकर ही आगे बढ़ाया है। पपेटरी को लेक र माना जाता है कि ये हास्य को ज्यादा हाईलाईट करती है। मैं इस बात से सहमत हूं, पर ऐसा नहीं है कि केवल हास्य ही कठपुतली का हिस्सा हो सकता है।  थियेटर में जिन गम्भीर विषयों को लिया जाता है उन विषयों को भी इस माध्यम से उठाया जा सकता है। माना ये भी जाता है कि मुगल काल में जब परदा प्रथा अपने चरम पर थी तो बादशाहों की बेगमों के लिये मनोरंजन के साधनों की दिक्कत थी ऐसे में एक ऐसी कला खोजी गई जिसमें कला का प्रदर्शन करने वाला खुद परदे के पीछे रहे ताकि बेगमों को परदे में रहने की जरुरत ना पड़े। ऐसे में कठपुतली कला का प्रचलन बढ़ा। 

ये भी माना जाता है कि अशोक के शासनकाल में जब शिलालेखों का प्रचलन आया तो जो लोग पढ़ लिख नहीं सकते उन लोगों में सरकारी फरमान और जानकारियां पहुंचाने में दिक्कत आने लगी ऐसे में राजा ने ऐसे लोगों तक कठपुतली के जरिये अपनी बात पहुंचवानी शुरु की। 

एक दौर ये भी आया कि लोग घर के झगड़े सुलझाने के लिये कठपुलियों की मदद लेने लगे। मसलन सास बहू का रिश्ता बिगड़ रहा है तो उसे सुधारने के लिये घर का कोई सदस्य कठपुतली कलाकार को बुला देता वो कठपुतलियों के जरिये परोक्ष रुप से ऐसी बातें कह जाता कि जिनका झगड़ा हुआ है उन्हें बात समझ आ जाती।

 साहित्य जब जुड़ा कठपुतली कला से 

कठपुतलियों की कला में कोई स्क्रिप्टिंग नहीं हुई। वो बाप दादाओं की सुनी कहानियों पर चला आ रहा है। जैसे आला उदल वगैरह। जो लोग इसमें काम कर रहे हैं उन्हें कला की समझ होना जरुरी है। 
मुझे अपना सबसे पसंदीदा कार्यक्रम जूता आविष्कार लगता है। ये मूलत: रविन्द्रनाथ टैगौर की लिखी कविता है जिसे श्रीलालशुक्ल ने हिन्दी में अनुवाद किया। इसी कविता को आधार बनाकर हेमेन्द्र कुमार भाटिया जी ने इस पर स्क्रिप्ट लिखी और अनुपम खेर के साथ मिलकर शो निर्देशित किया। मैने उसी का कठपुतली में रुपान्तरण करके लोगों के सामने रखा। 

इसके अलावा लखनऊ के हास्य पर आधारित आदाब अर्ज़ है, हरिशंकर परसाई की कहानियों पर आधारित इन्स्पेक्टर मातादीन, भोलाराम का जीव, मैं बिहार से चुनाव लड़ रहा हूं जैसे शो भी मैने किये हैं। बरसात के मौसम पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बात करता आया सावन हो या एड्स पर जागरुकता फैलाता एस आई वी की चौपाल मैने कोशिश की कि कठपुतलियों के जरिये हर तरह की कहानियां कही जाएं।

कठपुतली के   'सूत्रधार'

माना जाता है कि 4 हजार साल पहले भारतीय नाट््यशास्त्र में जिस सूत्रधार शब्द का उल्लेख आता है उसका सबंध इसी विधा से है। नाटक का मुख्य किरदार सूत्र यानी धागे की मदद से अपने किरदारों का संचालन करता था। धागे से चलने वाली कठपुतलियों के  चलन की शुरुआत यही से मानी जाती है। वो चाहे जापान का बुनराको हो या फिर चीन की शैडो पपेटरी दुनियाभर में कठपुतली के चरित्रों ने दर्शकों का मन मोहा है। 

मौलिकता बरकरार रखते हुए कला का बदलना भी जरुरी 


कला उस बूढ़े आदमी की तरह है, जो बुरी तरह बीमार है, या तो उसका इलाज करना होगा या उसे मर जाना होगा। मैं कठपुतलियों पर पिछले 10 साल से काम कर रहा हूं और इस बीच मैने देखा है कि आज कला में मौलिकता लगभग खत्म हो गई है। आप ढोल वगैरह में ही देख लीजिये प्लास्टिक की खाल को प्रयोग करने लगे हैं। उससे गूंज बदल जाती है। इस नयेपन को या तो हम स्वीकार कर सकते हैं या नकार सकते हैं। स्वीकार कर लेंगे तो वहीं से अविष्कार शुरु होता है। हमारे बाब दादा के समय में ये था वो था कहके काम नहीं चलेगा। आर्ट फार्म  का बचना भी जरुरी है और बदलना भी।  पर ज्यादा बदलाव भी नहीं किया जा सकता। अगर हम कठपुतली में मोटर लगा देंगे तो वो एक रोबोट हो जायेगा। हम उसके मूल रुप को ही बदल देंगे तो कला जिंदा कैसे रहेगी? उसका बदलना जरुरी है पर उसका मूल रुप भी बना रहना चाहिये। 

काश, हमारे देश से भी पर्यटक अच्छी यादें लेकर लौटते


 मैं पिछले साल 3 महीनों के लिए लंदन गई थी एक स्कॉलरशिप पर। दूसरे देशों में जाना, घूमना, रहना, वहां के लोगों से मिलना जुलना कई मायनों में आपकी सोच को बदलता है, विकसित करता है। हर वक्त आप अपने देश की तुलना उस देश से करते हैं, अपने लोगों के व्यवहार की तुलना वहां के लोगों से करते हैं। 

लंदन रहते हुए मैंने यूरोप के कुछ दूसरे देश भी घूमे। कुछ खास अनुभव हुए जो आज 5 महीने बाद भी याद हैं और शायद हमेशा याद रहेंगे। उन अनुभवों ने सोचने पर मजबूर किया, बहुत कुछ सिखाया। सोचा आज आपसे बांटूं। शायद हम सब मिलकर कुछ बदलाव ला सकें। मैंने कहीं पढ़ा था कि लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के कुछ ख़त रखे हैं। मैं वहां गई और उन ख़तों के बारे में पूछा। मुझे बताया गया कि वो बहुत कीमती दस्तावेज़ हैं इसलिए वो लोग उन्हें निकाल कर रखेंगे और तब मुझे बुलाया जाएगा। और वाकई ऐसा हुआ भी। मेरे पास एक मेल आया और मैं वापस पहुंची। जिस हिफाज़त से लक्ष्मीबाई और कुछ राजाओं के ख़त वहां रखे थे उसे देखकर मैं हैरान हो गई। 

हमारे देश के पुस्ताकलयों में न जाने कितनी बेशकीमती किताबें दीमक की भेंट चढ़ चुकी हैं और अभी भी चढ़ रही हैं। न जाने कितनी पुरानी फिल्मों के प्रिंट्स तबाह हो चुके हैं लेकिन किसी को परवाह नहीं। उस शाम काफी देर तक लाइब्रेरी में बैठी रही। वहां से कुछ दूरी पर ही ट्यूब स्टेशन था। लौटते वक्त मैं पैदल वहां पहुंची और ट्रेन में बैठने ही वाली थी कि अचानक याद आया कि मैं अपना सैमसंग गैलेक्सी टैबलेट लाइब्रेरी में चार्जिंग पर लगा छोड़ आई। आप समझ ही सकते हैं मेरा क्या हाल हुआ होगा। बेतहाशा दौड़ी और वापस लाइब्रेरी पहुंची। गार्ड से बहुत मिन्नत की कि मुझे अपना बैग बाहर ही छोड़ कर अंदर जाने दे लेकिन वो नहीं माना। वहां लोग नियम के बहुत पक्के होते हैं, चाहे कुछ हो जाए वो नियम नहीं तोड़ते। सो मुझे बैग को नियम के मुताबिक लॉकर में ही जमा करना पड़ा। फिर भागते हुए उस रीडिंग रूम में पहुंची और हांफते हुए गार्ड से बोली कि मेरा टैब वहां छूट गया है। जानते हैं क्या हुआ गार्ड ने बड़ी हैरानी से मेरी तरफ  देखा और बोला छूट गया था तो कल आ कर ले लेतीं आप। ऐसे भागने की क्या ज़रूरत थी। इतना कह कर वो गया और मेरा टैबलेट लाकर मेरे हाथ पर रख दिया। मैंने मुस्कुरा कर उसको थैंक यू कहा और मन में सोचा कि अगर मेरे अपने देश की किसी पब्लिक लाइब्रेरी में मेरा फोन छूट जाता तो क्या वापस मिलता? जवाब आप सब जानते ही हैं। 

ऐसा नहीं है कि मिलने कि बिलकुल गुंजाइश नहीं लेकिन ऐसी खुशकिस्मती की प्रतिशत बहुत कम होगी। फिर मैं स्विटजऱलैंड गई। वहां हमारे एक मित्र रहते हैं। वो हमें एक फार्म पर ले गए। वहां तरह-तरह के सेब, सेब का रस और कुछ और फल और सब्जिय़ां बहुत करीने से रखे थे। हमारे मित्र ने सेब उठाए, एक मशीन से सेब का रस कुछ गिलासों में भरा और एक डिब्बें में पैसे डाल दिए। मैंने उनसे पूछा इस फार्म का मालिक कहां है तो उन्होंने बताया कि मालिक हर वक्त वहां नहीं बैठता। लोग आते हैं, सामान लेते हैं और पैसे रख कर चले जाते हैं। अब तो आप समझ ही सकते हैं कि मेरे दिल पर क्या बीत रही होगी। हम तो अपने देश में दुकानदार होने के बावजूद हाथ साफ  करने में महारथ रखते हैं। पूरे यूरोप में कहीं भी चले जाइए, हर चर्च में मोमबत्तियां रखी होंगी और आकार के हिसाब से उनकी कीमत लिखी होगी। लेकिन उन पर नजऱ रखने वाला कोई नहीं होता। लोग जाते हैं, मोमबत्ती लेते हैं, पैसे वहीं रखे एक डिब्बे में डालते हैं और मोमबत्ती जला कर चले जाते हैं। चर्च एकदम साफ सुथरे और शांत। ये मेरे लिए सबसे बड़ी हैरत की बात थी और अपने देशवासियों के व्यवहार के लिए शर्मिंदा होने की बात भी। हमारे यहां धर्म के नाम पर जितनी चोरियां होती हैं उसका तो कोई हिसाब ही नहीं। किसी भी धार्मिक स्थान पर चले जाइए, आपकी जेब से पैसे निकालने वालों की होड़ लगी है। कोई ईश्वर के नाम पर लूटता है, कोई भीड़ का फायदा उठा कर जेब काटता है, कोई आपकी चप्पल ही लेकर रफू  चक्कर हो जाता है। हम अपने धार्मिक स्थलों पर जाकर क्या वाकई ईमानदारी दिखाते हैं? क्या वाकई अच्छे इंसानों जैसा व्यवहार करते हैं? नहीं, हम धक्का-मुक्की करते हैं, गंदगी फैलाते हैं, जल्दी दर्शन लेने के लिए जुगाड़ भी लगाते हैं और रिश्वत भी देते हैं। 

अपनी उस यात्रा से लौट कर मुझे लगा कि काश हम भी ऐसे होते कि हमारे देश से लौटने वाला हर पर्यटक हमारे देश की ऐसी ही मीठी यादें लेकर लौटता जैसे मैं यूरोप के देशों से लौटी। काश हम भी एक ईमानदार, अनुशासित, सफाईपसंद और सही मायनों में धार्मिक समाज की रचना कर पाते, काश!

लेखिका आईबीएन-7 चैनल पर 'जिंदगी लाइव' कार्यक्रम की एंकर हैं।

जिसे कभी मरने के लिए छोड़ दिया गया वो आज राष्ट्रपति पद की है दावेदार

ऐश्वर्या तिवारी

लखनऊ। अफगानिस्तान के  बद्खशन जिले में एक परिवार में पैदा हुई एक बच्ची। उसे जलती दोपहर में खुद ही मर जाने के लिए छोड़ दिया जाता है। पर भगवान  से इस बार गलती नहीं हुई थी और वो उसे वापस बुलाने को तैयार नहीं थे। फौजिय़ा कूफी बच गईं और  उनके परिवार ने उन्हें तरस खाकर  उन्हें अपना लिया। आज वो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति पद के लिए एक प्रबल दावेदार हैं। 

 फौजिय़ा की कहानी चौकाने वाली है। भारत की एक प्रख्यात हिंदी मैगज़ीन द्वारा आयोजित 'थिंक 2012; में फौजिय़ा सर पर हरा दुपट्टा रखे हुए बताती हैं, उनके परिवार से स्कूल जाने वाली वे अकेली लड़की थीं। पिता सांसद थे और फौजिय़ा ने पकिस्तान के प्रेस्टन विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया। पिता की मुजाहिद्दीन के हाथों हत्या के बाद फौजिय़ा ने राजनीति में कदम रखा। वो यूनीसेफ के साथ भी जुडी रहीं और कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर विस्थापितों की मदद में जुटी रहीं।

तालिबान का राज खत्म होने पर फौजिय़ा ने बद्खशन से चुनाव जीता और सांसद का पद हासिल किया। फौजिय़ा की लड़ाई सिर्फ  यहीं तक सीमित नहीं रही। वे अफगानी महिलाओं और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए कानून व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा लेकर आगे बढ़ रही हैं। अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रीय चुनाव में वे राष्ट्रपति के पद के लिए खड़ी हैं। 

अफगानिस्तान जैसे इस्लामी देश में, जो दशकों तक तालिबान के राज में रहा, फौजिय़ा जैसी महिलाओं के लिए जि़न्दगी आसान नहीं है। सभी सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़कर आगे बढऩे की उनकी जिद्द के कारण उन पर अभी तक कई आत्मघाती हमले हो चुके हैं। जब फौजिय़ा अपनी कहानी सुनाती हैं तो उनकी भाषा में पश्तो की मिठास झलकती है। अपने देश के लिए सजाये सपने उनकी आंखों में चमकते हैं। वे खुद को भाग्यशाली मानती हैं कि वो बच गयीं और अपने जैसी अफगानी बेटियों को बेहतर सुविधायें उपलब्ध कराना ही अब उनका उद्देश्य है।

आज जब हम अफगानिस्तान जैसे इस्लामी मुल्कों के बारे में सोचते हैं तो बरबस ही मन में एक नीले-काले बुर्खे के पीछे से झांकती दो आंखें मन में आती हैं। पर अब ज़रुरत है नज़रिया बदलने की। उन्ही आंखों में हमारे पड़ोसी देश का भविष्य भी है।

तस्वीर धीरे-धीरे ही सही, पर बदल रही है। जब पकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो की हत्या हुई तो पूरे विश्व ने उसका शोक मनाया। बेनज़ीर केवल पकिस्तान की राजनेता ही नहीं, हज़ारों लाखों महिलाओं के बदलते नज़रिए का प्रारूप थीं। यही प्रेरणा फौजिय़ा भी देती हैं।

प्रेरणा स्तम्भ हमारे देश की हर कामकाजी महिला, हर गृहणी होनी चाहिए। सूरत बदल रही है और हम इस बदलाव का हिस्सा हैं। प्रगति की गूंज हर तरफ  से उठ रही है, ज़रुरत है बस इसमें अपनी आवाज़ मिलाने की। कहानियां अलग हो सकती हैं पर अभिप्राय एक है। मकसद है हर महिला को स्वाभिमानी बनाने का। और इस मुहिम की शुरुआत संसद में नहीं, आपके घर में होगी।